SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 586

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शंयुर्बार्हस्पत्यः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- आरण्यं काण्डम् Gaan- आरण्य गान
Mantra with Swara
इ꣢न्द्र꣣ ज्ये꣡ष्ठं꣢ न꣣ आ꣡ भ꣢र꣣ ओ꣡जि꣢ष्ठं꣣ पु꣡पु꣢रि꣣ श्र꣡वः꣢ । य꣡द्दिधृ꣢꣯क्षेम वज्रहस्त꣣ रो꣡द꣢सी꣣ उ꣢꣯भे सु꣢꣯शिप्र पप्राः ॥५८६॥

इ꣡न्द्र꣢꣯ । ज्ये꣡ष्ठ꣢म् । नः꣣ । आ꣢ । भ꣣र । ओ꣡जि꣢꣯ष्ठम् । पु꣡पु꣢꣯रि । श्र꣡वः꣢꣯ । यत् । दि꣡धृ꣢꣯क्षेम । व꣣ज्रहस्त । वज्र । हस्त । रो꣡द꣢꣯सी꣣इ꣡ति꣢ । उ꣣भे꣡इति꣢ । सु꣣शिप्र । सु । शिप्र । पप्राः ॥५८६॥

Mantra without Swara
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भर ओजिष्ठं पुपुरि श्रवः । यद्दिधृक्षेम वज्रहस्त रोदसी उभे सुशिप्र पप्राः ॥

इन्द्र । ज्येष्ठम् । नः । आ । भर । ओजिष्ठम् । पुपुरि । श्रवः । यत् । दिधृक्षेम । वज्रहस्त । वज्र । हस्त । रोदसीइति । उभेइति । सुशिप्र । सु । शिप्र । पप्राः ॥५८६॥

Samveda - Mantra Number : 586
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 3; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (नः) हमें (श्रवः) ऐसा यश (आभर) दीजिये, जो कि (ज्येष्ठम्) सर्वश्रेष्ठ हो, (ओजिष्ठम्) शक्तिदायक हो, (युपुरि) हमें योगमार्ग पर आगे आगे ले जाने वाला हो, (यद्) जिसे कि (दिधृक्षेम) हम धारण करने की इच्छा कर रहे हैं । (वज्रहस्त) अपने न्यायवज्र द्वारा पापों का हनन करने वाले ! (सुशिप्र) तथा उपासकों के चेहरों में कांति प्रदान करके उन्हें ब्राह्मी तेज से सम्पन्न करने वाले ! आप (रोदसी) भूलोक और द्युलोक (उभे) दोनों में (पप्राः) भरपूर हुए हैं ।
Footnote
[ पृपुरि = पुर अग्रगमने (चुरादि)। हस्तः = हन्तेः (निरु० १। ३। ७) । सुशिप्र = शिप्रे हनू नासिके वा (निरु० ६। ४। १६), सु (शोभने) शिप्रे हनू नासिके यस्मात्, अर्थात् मुखाकृति को शोभायमान करने वाला ]