SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 560

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- रेणुर्वैश्वामित्रः Chhand- जगती Swara- निषादः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
त्रि꣡र꣢स्मै स꣣प्त꣢ धे꣣न꣡वो꣢ दुदुह्रिरे स꣣त्या꣢मा꣣शि꣡रं꣢ पर꣣मे꣡ व्यो꣢मनि । च꣣त्वा꣢र्य꣣न्या꣡ भुव꣢꣯नानि नि꣣र्णि꣢जे꣣ चा꣡रू꣢णि चक्रे꣣ य꣢दृ꣣तै꣡रव꣢꣯र्धत ॥५६०॥

त्रिः꣢ । अ꣣स्मै । सप्त꣢ । धे꣣न꣡वः꣢ । दु꣣दुह्रिरे । सत्या꣢म् । आ꣣शि꣡र꣢म् । आ꣣ । शि꣡र꣢꣯म् । प꣣रमे꣢ । व्यो꣢मन् । वि । ओ꣣मनि । चत्वा꣡रि꣢ । अ꣣न्या꣢ । अ꣣न् । या꣢ । भु꣡व꣢꣯नानि । नि꣣र्णि꣡जे꣢ । निः꣣ । नि꣡जे꣢꣯ । चा꣡रू꣢꣯णि । च꣣क्रे । य꣢त् । ऋ꣣तैः꣢ । अ꣡व꣢꣯र्धत ॥५६०॥

Mantra without Swara
त्रिरस्मै सप्त धेनवो दुदुह्रिरे सत्यामाशिरं परमे व्योमनि । चत्वार्यन्या भुवनानि निर्णिजे चारूणि चक्रे यदृतैरवर्धत ॥

त्रिः । अस्मै । सप्त । धेनवः । दुदुह्रिरे । सत्याम् । आशिरम् । आ । शिरम् । परमे । व्योमन् । वि । ओमनि । चत्वारि । अन्या । अन् । या । भुवनानि । निर्णिजे । निः । निजे । चारूणि । चक्रे । यत् । ऋतैः । अवर्धत ॥५६०॥

Samveda - Mantra Number : 560
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 9;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सप्तधेनवः) मुख्य छन्दों वाली वेदवाणियां, (अस्मै) इस उपासक के लिए (परमे व्योमन्) श्रेष्ठ हृदयाकाश में स्थिति परमात्मा से (त्रि) दिन-रात में तीन बार (सत्याम्) सत्य (आशिरम्) आशीर्वाद (दुदुहरे) दोहती हैं, इसे प्राप्त करती हैं । (यद्) और जब (ऋतै) सत्यानुष्ठानों द्वारा (अवर्धत) जीवात्मा योगमार्ग में वृद्धि पाता है, तब (निर्णिजे) चित्त के रजोगुण और तमोगुण को हटाकर अत्यन्त शुद्धि के लिए, इस जीवात्मा के (अन्या) अन्य (चत्वारि भुवनानि) चार भुवनों को (चारूणि चक्रे) परमात्मा सुचारु कर देता है ।
Footnote
[ त्रिः = संध्योपासना के दो सन्धिकाल नियत हैं, प्रातः सन्धि और सायं सन्धि । परन्तु योगाभ्यास के लिये वेद ने रात्रिकाल को अधिक उपयुक्त माना है । क्योंकि रात्रि काल शान्त काल होता है । अथर्ववेद में कहा है “ये रात्रिमनुतिष्ठन्ति ये च भूतेषु जाग्रति” (अथर्व० १९। ४८। ५), अर्थात् “जो रात्रि में अनुष्ठान करते हैं, और प्राणियों के सोए हुए जो अनुष्ठान के लिये जागते रहते हैं।” इस अभिप्राय का श्लोक गीता में भी है “या निशा सर्वभूतानां तस्यां जाग्रति संयमी” ।
निरुक्त में मध्य रात्रि और सूर्योदय के बीच के काल को अश्विनी का काल - कहा है । यथाः—“तयोः काल ऊर्ध्वमर्धरात्रात् प्रकाशीभावस्यानु विष्टम्भमनु तमोभागो हि मध्यमः, ज्योतिर्भाग आदित्यः” (१२। १।१) । तथा ऋग्वेद में कहा हैं कि सूर्योदय काल से जितने पूर्वकाल में जो अभ्यासी योगाभ्यास करता है वह उसी दृष्टि से अधिकाधिक श्रेष्ठ फल का भागी होता है, “पूर्वः पूर्वो यजमानो वनीयान्” (ऋ० ५। ७७।२)। यजमानः का अर्थ है “योगयज्ञ करने वाला” । अथर्ववेद में कहा है “नाम नाम्ना जोहवीति पुरा सूर्यात् पुरोषसः । यदजः संबभूव स ह तत् स्वराज्यमियाय यस्मान्नायत् परमस्ति भूतम्” (१०। ७। ३१) । अर्थात् जो अजन्मा जीवात्मा, उषाकाल और सूर्योदय से पहिले नाना नामों द्वारा परमात्मा (स्कम्भ) का आह्वान करता है, नाना नामों द्वारा उसकी स्तुति करता है, वह ही सर्वप्रथम उस स्वराज्य अर्थात् आत्मिक-राज्य को प्राप्त होता है, जिससे कि बढ़िया कोई वस्तु नहीं ।
धेनवः सत्यामाशिरम् = वेद वाणियों को अधेनु कहा है जब कि व्यक्ति मन्त्रों का केवल जप ही करता है, और न इनके अर्थों को जानता, और न उन अर्थों के अनुसार आचरण ही करता है । परन्तु वेद वाणियां उसके लिये धेनु हैं, दुधार गोएँ हैं, दूध देने वाली गोएँ हैं जो कि मन्त्र जप के साथ-साथ मन्त्रों के अर्थों को जान कर, विचार कर, तदनुकूल आचरण भी करता है । आध्यात्मिक दृष्टि में मन्त्रों का फल है “आध्यात्मिक तत्त्वों का ज्ञान और मोक्ष” । निरुक्त में लिखा है कि “अर्थ वाचः पुष्पफलमाह। याज्ञदैवते पुष्पफले दैवताध्यात्मे वा” (१। ६। १९) अतः “सत्याशीर्वाद” है आध्यात्मिक तत्त्वों का परितान और मोक्ष । धेनु = वाक् (निघं० १। ११) ।
चत्वारि भुवना = जीवात्मा के निवास के लिए ४ भुवन हैं,—शरीर, इन्द्रियाँ, हृदय, और मस्तिष्क । ]