SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 543

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡स꣢र्जि꣣ व꣢क्वा꣣ र꣢थ्ये꣣ य꣢था꣣जौ꣢ धि꣣या꣢ म꣣नो꣡ता꣢ प्रथ꣣मा꣡ म꣢नी꣣षा꣣ । द꣢श꣣ स्व꣡सा꣢रो꣣ अ꣢धि꣣ सा꣢नो꣣ अ꣡व्ये꣢ मृ꣣ज꣢न्ति꣣ व꣢ह्नि꣣ꣳ स꣡द꣢ने꣣ष्व꣡च्छ꣢ ॥५४३॥

अ꣡स꣢꣯र्जि । व꣡क्वा꣢꣯ । र꣡थ्ये꣢꣯ । य꣡था꣢꣯ । आ꣣जौ꣢ । धि꣣या꣢ । म꣣नो꣡ता꣢ । प्र꣣थमा꣢ । म꣣नीषा꣢ । द꣡श꣢꣯ । स्व꣡सा꣢꣯रः । अ꣡धि꣢꣯ । सा꣡नौ꣢꣯ । अ꣡व्ये꣢꣯ । मृ꣣ज꣡न्ति꣢ । व꣡ह्नि꣢꣯म् । स꣡द꣢꣯नेषु । अ꣡च्छ꣢꣯ ॥५४३॥

Mantra without Swara
असर्जि वक्वा रथ्ये यथाजौ धिया मनोता प्रथमा मनीषा । दश स्वसारो अधि सानो अव्ये मृजन्ति वह्निꣳ सदनेष्वच्छ ॥

असर्जि । वक्वा । रथ्ये । यथा । आजौ । धिया । मनोता । प्रथमा । मनीषा । दश । स्वसारः । अधि । सानौ । अव्ये । मृजन्ति । वह्निम् । सदनेषु । अच्छ ॥५४३॥

Samveda - Mantra Number : 543
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(यथा) जैसे कि पूर्व मन्त्रों में कहा है कि (रथ्ये आजौ) शरीर रथ में होने वाले, देवासुर संग्राम में, जब (घिया) ध्यान विधि द्वारा (मनोता) मन में ओत-प्रोत (प्रथमा) सर्वश्रेष्ठ (मनीषा) प्रज्ञा, अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा, (असर्जि) प्रकट होती है, तब (अव्ये) रक्षायोग्य भूमण्डल में (अधि सानः) अधिकाधिक भोग सामग्री देने वाला (वक्वा) वेद प्रवक्ता प्रभु (असर्जि) प्रकट हो जाता है । और तब ध्याता की (दश) दस ऐन्द्रियिक शक्तियों, (स्वसारः) बहिनों के सदृश एक साथ होकर, (सदनेषु) जीवात्मा के वास के कोशों में, (वह्निम) जगद्वाहक प्रभु को, (अच्छ) स्पष्ट रूप में (मृजन्ति) विशुद्ध रूप में प्रकट कर देती हैं ।
Footnote
[ मनीषी = मेधावी (निघं० ३। १५), अतः मनीषा = मेधा, प्रज्ञा । रथ्ये = “आत्मनं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु” (कठ० अ० १ ब्रा० ३ खंड० ३) । दश = ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और ५ कर्मेन्द्रियां जो कि पहले जीवात्मा को संसारी बना रही थीं, अब वे ही १० इन्द्रियां संसार से विमुख होकर, संसार में परमेश्वरीय विभूतियों का दर्शन कराती हुई, जगद्वाहक परमेश्वर को प्रकट कराने में लग जाती हैं। सदनेषु = जीवात्मा के ५ सदन कहे हैं। ये हैं अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, और आनन्दमय कोश ।