SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 462

1871 Mantra
Devata- मरुतः Rishi- एवयामरुदात्रेयः Chhand- अतिजगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ वो꣢ म꣣हे꣢ म꣣त꣡यो꣢ यन्तु꣣ वि꣡ष्ण꣢वे म꣣रु꣡त्व꣢ते गिरि꣣जा꣡ ए꣢व꣣या꣡म꣢रुत् । प्र꣡ शर्धा꣢꣯य꣣ प्र꣡ यज्य꣢꣯वे सुखा꣣द꣡ये꣢ त꣣व꣡से भ꣣न्द꣡दि꣢ष्टये꣣ धु꣡नि꣢व्रताय꣣ श꣡व꣢से ॥४६२॥

प्र꣢ । वः꣣ । महे꣢ । म꣣त꣡यः꣢ । य꣣न्तु । वि꣡ष्ण꣢꣯वे । म꣣रु꣡त्व꣢ते । गि꣣रिजाः꣢ । गि꣣रि । जाः꣢ । ए꣣वया꣡म꣢रुत् । ए꣣वया꣢ । म꣣रुत् । प्र꣢ । श꣡र्धा꣢꣯य । प्र । य꣡ज्य꣢꣯वे । सु꣣खाद꣡ये꣢ । सु꣣ । खाद꣡ये꣢ । त꣣व꣡से꣢ । भ꣣न्द꣡दि꣢ष्टये । भ꣣न्द꣢त् । इ꣣ष्टये । धु꣡नि꣢꣯व्रताय । धु꣡नि꣢꣯ । व्र꣣ताय । श꣡व꣢꣯से ॥४६२॥

Mantra without Swara
प्र वो महे मतयो यन्तु विष्णवे मरुत्वते गिरिजा एवयामरुत् । प्र शर्धाय प्र यज्यवे सुखादये तवसे भन्ददिष्टये धुनिव्रताय शवसे ॥

प्र । वः । महे । मतयः । यन्तु । विष्णवे । मरुत्वते । गिरिजाः । गिरि । जाः । एवयामरुत् । एवया । मरुत् । प्र । शर्धाय । प्र । यज्यवे । सुखादये । सु । खादये । तवसे । भन्ददिष्टये । भन्दत् । इष्टये । धुनिव्रताय । धुनि । व्रताय । शवसे ॥४६२॥

Samveda - Mantra Number : 462
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 12;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासको ! (वः) तुम्हारी (मतयः) मतियां परमेश्वर के प्रति (प्रयन्तु) प्रयाण करें—जो परमेश्वर (महे) महान् है, (विष्णवे) सर्वत्र व्यापक है, (मरुत्वते) तथा प्राणों का स्वामी है । मतियां (प्र) उसके प्रति प्रयाण करें जो कि (शर्धाय) बलस्वरूप है । (प्र) उसके प्रति प्रयाण करें जो कि (यज्यवे) उपासना - कर्मों को चाहता है, (सुखादये) सुखों का आदि स्रोत, (तवसे) गति-स्वरूप और वृद्धि प्रदाता है, (भन्ददिष्टये) हमारे अभीष्टों को कल्याणमय और सुखदायी बनाता है, (धुनिव्रताय) पापों को कंपा देने के व्रतवाला है, (शवसे) और शक्तिस्वरूप है । जिस उपासक ने (गिरिजाः) वेद की वाणियों में जन्म लिया है, अर्थात् वेदोपदेशों के अनुसार जो द्विजन्मा बन गया है, वह उपासक (मरुत्) प्राणस्वरूप होकर (एवया) इस प्रकार परमेश्वर को प्राप्त हो जाता है ।
Footnote
[ विष्णवे = विष्लृ व्याप्तौ । मरुत् = प्राण । उपासक, समाधि में, जब शरीर और इन्द्रियों से निष्चेष्ट हो जाता है, केवल श्वास-प्रश्वास ही नासिका में गतिशील रहते हैं, उस समय उपासक मानो प्राणस्वरूप सा हो रहा होता है । सुखादये = सुख + आदि + चतुर्थी विभक्ति ]