SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 460

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- रेभः काश्यपः Chhand- अतिजगती Swara- निषादः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
त꣡मिन्द्रं꣢꣯ जोहवीमि म꣣घ꣡वा꣢नमु꣣ग्र꣢ꣳ स꣣त्रा꣡ दधा꣢꣯न꣣म꣡प्र꣢तिष्कुत꣣ꣳ श्र꣡वा꣢ꣳसि꣣ भू꣡रि꣢ । म꣡ꣳहि꣢ष्ठो गी꣣र्भि꣡रा च꣢꣯ य꣣ज्ञि꣡यो꣢ ववर्त्त रा꣣ये꣢ नो꣣ वि꣡श्वा꣢ सु꣣प꣡था꣢ कृणोतु व꣣ज्री꣢ ॥४६०॥

त꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । जो꣣हवीमि । मघ꣡वा꣢नम् । उ꣣ग्र꣢म् । स꣣त्रा꣢ । द꣡धा꣢꣯नम् । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतम् । अ । प्र꣣तिष्कुतम् । श्र꣡वाँ꣢꣯सि꣣ । भू꣡रि꣢꣯ । मँ꣡हि꣢꣯ष्ठः । गी꣣र्भिः꣢ । आ । च꣣ । यज्ञि꣡यः꣢ । व꣣वर्त । राये꣢ । नः꣣ । वि꣡श्वा꣢꣯ । सु꣣प꣡था꣢ । सु꣣ । प꣡था꣢꣯ । कृ꣣णोतु । वज्री꣢ ॥४६०॥

Mantra without Swara
तमिन्द्रं जोहवीमि मघवानमुग्रꣳ सत्रा दधानमप्रतिष्कुतꣳ श्रवाꣳसि भूरि । मꣳहिष्ठो गीर्भिरा च यज्ञियो ववर्त्त राये नो विश्वा सुपथा कृणोतु वज्री ॥

तम् । इन्द्रम् । जोहवीमि । मघवानम् । उग्रम् । सत्रा । दधानम् । अप्रतिष्कुतम् । अ । प्रतिष्कुतम् । श्रवाँसि । भूरि । मँहिष्ठः । गीर्भिः । आ । च । यज्ञियः । ववर्त । राये । नः । विश्वा । सुपथा । सु । पथा । कृणोतु । वज्री ॥४६०॥

Samveda - Mantra Number : 460
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 12;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(तम्) उस (इन्द्रम्) परमेश्वर का (जोहवीमि) बार-बार और श्रद्धापूर्ण-भक्ति से मैं आह्वान करता हूँ । (मघवानम्) जो परमेश्वर ऐश्वर्यों का स्वामी है, (उग्रम्) नियमों में उग्र है, जो (सत्रा) सत्य है, और जो (भूरि) बहुत (श्रवांसि) धनों और यशों को (दधानम्) धारण करता, (अप्रतिष्कुतम्) और विरोधी शक्तियों द्वारा झुकाया नहीं जा सकता, (मंहिष्ठम्) पूजनीय और महादानी है, उसका मैं आह्वान करता हूँ । (यज्ञियः) वह यज्ञ कर्मों में एकमात्र पूजनीय देव है । वह (राधे) आध्यात्मिक और सांसारिक सम्पत्तियों के प्रदान के लिये (गौभिः) स्तुति प्रार्थना की वाणियों द्वारा (घ्रा ववर्त) उपासकों की ओर प्राकृष्ट हो जाता है । वह (नः) हमारे (विश्वा श्रवांसि) सब प्रकार की सम्पत्तियों और यशों को (सुपथा) सुपथ द्वारा प्रापणीय (कृणोतु) करे, और कुपथों पर (वज्री) वज्रप्रहार करे ।
Footnote
[ सुपथा; - “अग्ने नय सुपथा रायेऽस्मान्” (यजु० ४०। १६) ।