SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 449

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बन्धुः सुबन्धुः श्रुतबन्धुर्विप्रबन्धुश्च क्रमेण गोपायना लौपायना वा Chhand- द्विपदा गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
भ꣢गो꣣ न꣢ चि꣣त्रो꣢ अ꣣ग्नि꣢र्म꣣हो꣢नां꣣ द꣡धा꣢ति꣣ र꣡त्न꣢म् ॥४४९

भ꣣गः꣢꣯ । न । चि꣣त्रः꣢ । अ꣣ग्निः꣢ । म꣣हो꣡ना꣢म् । द꣡धा꣢꣯ति । र꣡त्न꣢꣯म् ॥४४९॥

Mantra without Swara
भगो न चित्रो अग्निर्महोनां दधाति रत्नम् ॥४४९

भगः । न । चित्रः । अग्निः । महोनाम् । दधाति । रत्नम् ॥४४९॥

Samveda - Mantra Number : 449
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
प्रातः काल का (भगः) सूर्य, (न) जैसे उषा की छटा में नानाविध रंगों में (चित्रः) चित्रित होता है, वैसे ही (अग्निः) जगन्नेता परमेश्वर, संसार की विविध छटाओं में नानाविध रूपों में चित्रित हो रहा है । वह परमेश्वर (महोनाम्) महान् आत्माओं के (रत्नम्) आध्यात्मिक - रत्न अर्थात् मोक्ष - रत्न को (दधाति) हम उपासकों में भी स्थापित करता है ।
Footnote
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