SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 431

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्दुः꣢ पविष्ट꣣ चा꣢रु꣣र्म꣡दा꣢या꣣पा꣢मु꣣प꣡स्थे꣢ क꣣वि꣡र्भ꣢꣯गाय ॥४३१॥

इ꣡न्दुः꣢ । प꣣विष्ट । चा꣡रुः꣢꣯ । म꣡दा꣢꣯य । अ꣣पा꣢म् । उ꣣प꣡स्थे꣢ । उ꣣प꣢ । स्थे꣣ । कविः꣢ । भ꣡गा꣢꣯य ॥४३१॥

Mantra without Swara
इन्दुः पविष्ट चारुर्मदायापामुपस्थे कविर्भगाय ॥

इन्दुः । पविष्ट । चारुः । मदाय । अपाम् । उपस्थे । उप । स्थे । कविः । भगाय ॥४३१॥

Samveda - Mantra Number : 431
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्दुः) चन्द्रमा की तरह उपासक में शान्त प्रकाश उत्पन्न करने वाला प्रशान्त भक्तिरस (पविष्ट) हमें पवित्र करता है । यह भक्तिरस (चारुः) रमणीय और रुचिकर है। जहां (अपाम्) रक्त-रूपी-जलों की (उपस्थे) उपस्थित है उस हृदय में यह भक्तिरस उपस्थित होकर (मदाय) हर्ष और तृप्ति प्रकट करता है । यह हममें (कविः) कवित्व शक्ति को जागरित करता, और हमें (भगाय) भजनीय परमेश्वर की ओर ले जाता है ।
Footnote
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