SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 430

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हे꣢꣫ दक्षा꣣या꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ वा꣣जी꣡ धना꣢य ॥४३०॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । महे꣢ । द꣡क्षा꣢꣯य । अ꣡श्वः꣢꣯ । न । नि꣣क्तः꣢ । वा꣣जी꣢ । ध꣡ना꣢꣯य ॥४३०॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम महे दक्षायाश्वो न निक्तो वाजी धनाय ॥

पवस्व । सोम । महे । दक्षाय । अश्वः । न । निक्तः । वाजी । धनाय ॥४३०॥

Samveda - Mantra Number : 430
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सोम) हे भक्तिरस ! तू हमें (पवस्व) पवित्र कर, हमें (महे दक्षाय) महाशक्ति प्रदान करने के लिये । (वाजी) तू बल का दाता है । तू हमें (धनाय) आध्यात्मिक - धन प्रदान कर । (निक्तः) शुद्ध और परिपुष्ट (अश्वः न) अश्व के सदृश हे भक्तिरस ! तू (निक्तः) शुद्ध है और उपासना के लिये परिपुष्टावस्था को, परिपक्वावस्था को प्राप्त है ।
Footnote
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