SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 415

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢क्ष꣣न्न꣡मी꣢मदन्त꣣ ह्य꣡व꣢ प्रि꣣या꣡ अ꣢धूषत । अ꣡स्तो꣢षत꣣ स्व꣡भा꣢नवो꣣ वि꣢प्रा꣣ न꣡वि꣢ष्ठया म꣣ती꣢꣫ योजा꣣꣬ न्वि꣢꣯न्द्र ते꣣ ह꣡री꣢ ॥४१५॥

अ꣡क्ष꣢꣯न् । अ꣡मी꣢꣯मदन्त । हि । अ꣡व꣢꣯ । प्रि꣣याः꣢ । अ꣣धूषत । अ꣡स्तो꣢꣯षत । स्व꣡भा꣢꣯नवः । स्व । भा꣣नवः । वि꣡प्राः꣢꣯ । वि । प्राः꣣ । न꣡वि꣢꣯ष्ठया । म꣣ती꣢ । यो꣡ज꣢꣯ । नु । इ꣣न्द्र । ते । ह꣢री꣣इ꣡ति꣢ ॥४१५॥

Mantra without Swara
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ॥

अक्षन् । अमीमदन्त । हि । अव । प्रियाः । अधूषत । अस्तोषत । स्वभानवः । स्व । भानवः । विप्राः । वि । प्राः । नविष्ठया । मती । योज । नु । इन्द्र । ते । हरीइति ॥४१५॥

Samveda - Mantra Number : 415
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
उपासक, हम गृहस्थों के (अक्षन्) समीप आए हैं, उन्होंने हमारे (अक्षन्) भोजन-सत्कार को स्वीकार किया है, और वे (अमीमदन्त) तृप्त हुए हैं। उन (प्रियाः) प्रिय उपासकों ने सदुपदेशों द्वारा हम गृहस्थों की विघ्न-बाधाओं को (अव-अधूषत) दूर कर दिया है । (स्वमानवः) वे उपासक स्वात्म-प्रकाश से प्रकाशित हैं। इन्होंने (नविष्ठया) अति प्रशंसित नवीन (मती) मतियों द्वारा हमारे लिए ज्ञानों का (अस्तोषत) कथन किया है । इसलिये (इन्द्र) हे परमेश्वर ! हमारे ज्ञानेन्द्रिय-ओर-कर्मेन्द्रिय रूपी (हरी) घोड़ों को, जो कि विषयों में हरण करते हैं, (योजा) योगविधि से युक्त कर दीजिये । ये दोनों प्रकार की इन्द्रिएं (ते) आपके प्रति सुपुर्द हैं।
Footnote
[ अक्षन् = अशूङ् व्याप्ती, तथा अश् भोजने ]