SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 384

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- पर्वतः काण्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
य꣡त्सोम꣢꣯मिन्द्र꣣ वि꣡ष्ण꣢वि꣣ य꣡द्वा꣢ घ त्रि꣣त꣢ आ꣣प्त्ये꣢ । य꣡द्वा꣢ म꣣रु꣢त्सु꣣ म꣡न्द꣢से꣣ स꣡मिन्दु꣢꣯भिः ॥३८४॥

य꣢त् । सो꣡म꣢꣯म् । इ꣣न्द्र । वि꣡ष्ण꣢꣯वि । यत् । वा꣣ । घ । त्रिते꣢ । आ꣣प्त्ये꣢ । यत् । वा꣣ । मरु꣡त्सु꣢ । म꣡न्द꣢꣯से । सम् । इ꣡न्दु꣢꣯भिः ॥३८४॥

Mantra without Swara
यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये । यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः ॥

यत् । सोमम् । इन्द्र । विष्णवि । यत् । वा । घ । त्रिते । आप्त्ये । यत् । वा । मरुत्सु । मन्दसे । सम् । इन्दुभिः ॥३८४॥

Samveda - Mantra Number : 384
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे परमेश्वर ! (विष्णवि) सूर्य में (यत्) जो (सोमम्) भक्तिरस है उसका आप (मन्दसे) आनन्द लेते हैं । (त्रिते) तीसरे लोक अर्थात् द्युलोक में (यत्) जो भक्तिरस है उसका आप (मन्दसे) आनन्द लेते हैं, (वा) तथा (आप्त्ये) जल-वाले लोक अर्थात् पृथिवी लोक और अन्तरिक्ष लोक में (यत्) जो भक्तिरस है उसका आप (मन्दसे) आनन्द लेते हैं । (मरुत्सु) वायुनों और मानसूनों में (यद् वा) जो भक्तिरस है उसका आप (मन्दसे) आनन्द लेते हैं । इस तरह आनन्द लेते हैं जैसे कि (इन्दुभिः) चन्द्रमा की शुभ्र ज्योत्स्नाओं द्वारा प्रजाजन आनन्द लेते हैं ।
Footnote
[ इस मन्त्र में यह दर्शाया है कि सभी संसार आपके प्रति आत्म-समर्पण किए हुए है । संसार के एक एक पदार्थ में मानो भक्तिरस उमड़ रहा है ! यथाः—“तस्याम् : सर्वे यातवः उप प्रशिषमासते” (अथर्व० १३। ३। ४। २७) अर्थात् ब्रह्माण्ड के सभी गतिमान् पिण्ड उस परमेश्वर के उत्तम शासन की उपासना कर रहे हैं, अर्थात् अपने आपको उसके प्रति समर्पित कर रहे हैं । तथा “यस्य विश्व उपासते प्रशिषम्” (यजु० २५। १३) ; अर्थात् संसार के सभी पदार्थ जिस के प्रशासन की उपासना करते हैं ]