SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 368

1871 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- त्रित आप्त्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣मी꣡ ये दे꣢꣯वा꣣ स्थ꣢न꣣ म꣢ध्य꣣ आ꣡ रो꣢च꣣ने꣢ दि꣣वः꣢ । क꣡द्ध꣢ ऋ꣣तं꣢꣫ कद꣣मृ꣢तं꣣ का꣢ प्र꣣त्ना꣢ व꣣ आ꣡हु꣢तिः ॥३६८॥

अ꣣मी꣡इति꣢ । ये दे꣣वाः । स्थ꣡न꣢꣯ । स्थ । न꣣ । म꣡ध्ये꣢꣯ । आ । रो꣣चने꣢ । दि꣣वः꣢ । कत् । वः꣣ । ऋत꣢म् । कत् । अ꣣मृ꣡त꣢म् । अ꣣ । मृ꣡त꣢꣯म् । का꣢ । प्र꣣त्ना꣢ । वः꣢ । आ꣡हु꣢꣯तिः । आ । हु꣣तिः ॥३६८॥

Mantra without Swara
अमी ये देवा स्थन मध्य आ रोचने दिवः । कद्ध ऋतं कदमृतं का प्रत्ना व आहुतिः ॥

अमीइति । ये देवाः । स्थन । स्थ । न । मध्ये । आ । रोचने । दिवः । कत् । वः । ऋतम् । कत् । अमृतम् । अ । मृतम् । का । प्रत्ना । वः । आहुतिः । आ । हुतिः ॥३६८॥

Samveda - Mantra Number : 368
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(देवाः) हे चमकीले तारागणो ! (अमी) यह जो तुम (दिवः) द्युलोक के (आ) सर्वत्र (रोचने) चमकीले आकाश में, (मध्ये) मध्य मध्य में, (स्थन) विद्यमान हो, बताओ ! कि वह (कत्) कौन सी शक्ति है जो कि (वः) तुम में (ऋतम्) नियामक - रूप में कार्य कर रही है ! वह (कत्) कौन सी (अमृतम्) अमर-शक्ति है जो कि तुम्हें अमर सा बना रही है ! तथा यह भी बतायो कि वह (का) कौन सी (प्रत्ना) पुरातन शक्ति है जिसके प्रति (वः) तुम्हारी (आहुतिः) आत्माहुति हुई हुई है ?
Footnote
[ उपासक जब रात्रि में द्युलोक की ओर दृष्टि फैलाता है तब वह चमकते नक्षत्रों में, परमेश्वर की विभूति का भान पाकर, इस प्रकार के स्वाभविक प्रश्न करता है । ]