SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 365

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
स꣢ घा꣣ य꣡स्ते꣢ दि꣣वो꣡ नरो꣢꣯ धि꣣या꣡ मर्त꣢꣯स्य꣣ श꣡म꣢तः । ऊ꣣ती꣡ स बृ꣢꣯ह꣣तो꣢ दि꣣वो꣢ द्वि꣣षो꣢꣫ अꣳहो꣣ न꣡ त꣢रति ॥३६५॥

सः꣢ । घ꣣ । यः꣢ । ते꣣ । दिवः꣢ । न꣡रः꣢꣯ । धि꣣या꣢ । म꣡र्त꣢꣯स्य । श꣡म꣢꣯तः । ऊ꣣ती꣢ । सः । बृ꣣हतः꣢ । दि꣣वः꣢ । द्वि꣣षः꣢ । अँ꣡हः꣢꣯ । न । त꣣रति ॥३६५॥

Mantra without Swara
स घा यस्ते दिवो नरो धिया मर्तस्य शमतः । ऊती स बृहतो दिवो द्विषो अꣳहो न तरति ॥

सः । घ । यः । ते । दिवः । नरः । धिया । मर्तस्य । शमतः । ऊती । सः । बृहतः । दिवः । द्विषः । अँहः । न । तरति ॥३६५॥

Samveda - Mantra Number : 365
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे उपासक ! (सः) वह परमेश्वर (घ) ही सच्चा पति है (यः) जो कि (धिया) ज्ञान और कर्म की शिक्षा द्वारा (ते) तेरा (नरः) नेता अर्थात् मार्गदर्शक बना है । वह परमेश्वर (मर्तस्य) उस उपासक का नेता बनता है कि जो उपासक आध्यात्मिक (दिवः) प्रकाश-सम्पन्न है तथा (शमतः) शान्त-स्वरूप है । (बृहतः) महान् तथा (दिवः) प्रकाश-स्वरूप परमेश्वर की (ऊती) रक्षा पाकर (सः) वह उपासक, उपासना-मार्ग के (द्विषः) विघ्न-बाधा रूपी शत्रुओं के नद को (तरति) तर जाता है, (न) जैसे कि वह (अंहः) पाप रूपी नद को तर जाता है ।
Footnote
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