SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 34

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- उशना काव्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
क꣡स्य꣢ नू꣣नं꣡ प꣢꣯रीणसि꣣ धि꣡यो꣢ जिन्वसि सत्पते । गो꣡षा꣢ता꣣ य꣡स्य꣢ ते꣣ गि꣡रः꣢ ॥३४॥

क꣡स्य꣢꣯ । नू꣣न꣢म् । प꣡री꣢꣯णसि । प꣡रि꣢꣯ । न꣣सि । धि꣡यः꣢꣯ । जि꣣न्वसि । सत्पते । सत् । पते । गो꣡षा꣢꣯ता । गो꣢ । सा꣣ता । य꣡स्य꣢꣯ । ते꣣ । गि꣡रः꣢꣯ ॥३४॥

Mantra without Swara
कस्य नूनं परीणसि धियो जिन्वसि सत्पते । गोषाता यस्य ते गिरः ॥

कस्य । नूनम् । परीणसि । परि । नसि । धियः । जिन्वसि । सत्पते । सत् । पते । गोषाता । गो । साता । यस्य । ते । गिरः ॥३४॥

Samveda - Mantra Number : 34
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(सत्पते) हे सच्चे स्वामिन् ! आप (नूनम्) निश्चय से (कस्य) किसकी (धियः) बुद्धियों और कर्मों को (परीणसि) भरपूर (जिन्वसि) तृप्त कर देते हैं, संतुष्ट कर देते हैं ? आप उसकी बुद्धियों और कर्मों को भरपूर तृप्त अर्थात् सन्तुष्ट करते हैं (ते) आप की (गिरः) वेद वाणियां, (यस्य) जिस की (गोषाताः) इन्द्रियों में तृप्ति प्रदान कर देती हैं।
[बुद्धि, इन्द्रियां, और कर्म, ये तीन साधन हैं प्रवृत्तियों के । बुद्धि में ज्ञान और इच्छा प्रकट हुई तो इन्द्रियों के द्वार बनाकर कर्मों द्वारा उन इच्छाओं को पूरा किया जाता है । जिस व्यक्ति की इन्द्रियों में तृप्ति प्रकट हो जाती है ? उस की बुद्धि और कर्म भी तृप्त रहते हैं । मन्त्र में इन्द्रिय निग्रह तथा इन्द्रियसंयम का वर्णन हुआ है ।
Footnote
[ गोषाताः = गो (इन्द्रियां) + षणु (दाने) ]