SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 323

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- द्युतानो मारुतः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣡व꣢ द्र꣣प्सो꣡ अ꣢ꣳशु꣣म꣡ती꣢मतिष्ठदीया꣣नः꣢ कृ꣣ष्णो꣢ द꣣श꣡भिः꣢ स꣣ह꣡स्रैः꣢ । आ꣢व꣣त्त꣢꣫मिन्द्रः꣣ श꣢च्या꣣ ध꣡म꣢न्त꣣म꣢प꣣ स्नी꣡हि꣢तिं नृ꣣म꣡णा꣢ अध꣣द्राः꣢ ॥३२३॥

अ꣡व꣢꣯ । द्र꣣प्सः꣢ । अ꣣ऽशुम꣡ती꣢म् । अ꣣तिष्ठत् । ईयानः꣢ । कृ꣣ष्णः꣢ । द꣣श꣡भिः꣢ । स꣣ह꣡स्रैः꣢ । आ꣡व꣢꣯त् । तम् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । श꣡च्या꣢꣯ । ध꣡म꣢꣯न्तम् । अ꣡प꣢꣯ । स्नी꣡हि꣢꣯तिम् । नृ꣣म꣡णाः꣢ । नृ꣣ । म꣡नाः꣢꣯ । अ꣣धत् । राः꣢ ॥३२३॥

Mantra without Swara
अव द्रप्सो अꣳशुमतीमतिष्ठदीयानः कृष्णो दशभिः सहस्रैः । आवत्तमिन्द्रः शच्या धमन्तमप स्नीहितिं नृमणा अधद्राः ॥

अव । द्रप्सः । अऽशुमतीम् । अतिष्ठत् । ईयानः । कृष्णः । दशभिः । सहस्रैः । आवत् । तम् । इन्द्रः । शच्या । धमन्तम् । अप । स्नीहितिम् । नृमणाः । नृ । मनाः । अधत् । राः ॥३२३॥

Samveda - Mantra Number : 323
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 10;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
योगाङ्गों के अभ्यास द्वारा चित्त में प्रकट हुई (अंशुमतीम्) प्रकाशमयी या ज्योतिमयी सात्त्विक - शुक्ल- चित्तवृत्ति को, बीच-बीच में (कृष्णः) तामसिक चित्त-वृत्तियाँ (द्रप्सः) बिन्दुरूपों में अर्थात् सूक्ष्म रूपों में (ईयानः) आती रहती हैं, और चित्त में (दशभिः सहस्रैः) अनगिनत रूपों में (अव अतिष्ठत) या ठहरती हैं । (धमन्तम्) साँप की तरह फुंकारती हुई (तम् स्नीहितिम्) उस सूक्ष्मरूपमयी हिंस्र कृष्ण - चित्तवृत्ति को (नृमणाः इन्द्रः) उपासकों के लिये उपकारी मन वाला परमेश्वर, (शच्या) निजशक्ति द्वारा (अप आ अवत्) अलग कर देता है, (अघ) तदनन्तर उन्हें (द्राः) भगा देता है ।
Footnote
[द्रप्सः = स्तोको वै द्रप्सः गो० २। २। १२) Drops । स्नीहितिम् = स्नेहति बधकर्मा (निघं० २। १९) दशभिः सहस्रैः — सहस्र शब्द “अनगिनत” अर्थ का सूचक है । जैसे कि सहस्रांशु, सहस्ररश्मि, सहस्रशृङ्ग आदि शब्दों में, —जो कि सूर्यवाचक हैं - सूर्य की किरणों के सम्बन्ध में सहस्र शब्द का प्रयोग होता है । सूर्य जब उदित होता है तब इस की अनगिनत किरणें दसों दिशाओं में फैल जाती हैं । ४ मुख्य दिशाएँ, ४ अवान्तर दिशाएँ अर्थात् उपदिशाएँ, तथा दो ध्रुवा और ऊर्ध्वा दिशाएँ, — ये दस दिशाएँ हैं । इन दिशाओं की दृष्टि से सूर्य की किरणें और भी अधिक अनगिनत हो जाती हैं। “दशभिः सहस्रः” का अभिप्राय है, — अनगिनत असंख्यात । इस सम्बन्ध में बौद्ध-साहित्य में भी एक प्रमाण मिला है । बौद्ध आचार्य आर्यसंघ ने अपने तिब्बतीय - उपदेशों में “दशभिः सहस्रः” की चर्चा की है, जिसका कि अंग्रेजी अनुवाद निम्नलिखित है :-
“Hold firm ! Thou rearest now the middle portal, the gate of woe, with its Ten Thousand snares” (Talks on the path of occultism, Vol II, The Voice of the Silence, by Annie Besant, C. W. Leadbeater, 1964 edition, Page, 323)
“Ten Thousand snares”; “कृष्णः द्रप्सः दशभिः सहस्रः” का अनुवाद प्रतीत होता है । इसी प्रकार “षष्टिं सहस्रा नैगुतो वसूनि” मन्त्र संख्या ११०५ में भी “षष्टि सहस्रा” द्वारा अर्थ अनगिनत अर्थात् असंख्यात ही समझना चाहिये । यदि ११०५ मन्त्र में चारों वेदों के लगभग २० हजार मन्त्रों के अर्थत्रय की दृष्टि से ६० हजार अर्थ लिया जाय तो मन्त्र संख्या ३२३ में “दशभिः सहस्रैः” द्वारा ऋग्वेद के लगभग १० हजार मन्त्रों में उपदिष्ट सद्भावों के प्रतिद्वन्द्वी असद्भावों का ग्रहण करना भी अनभीष्ट न होगा । ]