SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 305

1871 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- अश्विनौ वैवस्वतौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
कु꣢ष्ठः꣣ को꣡ वा꣢मश्विना तपा꣣नो꣡ दे꣢वा꣣ म꣡र्त्यः꣢ । घ्न꣣ता꣡ वा꣢मश्न꣣या꣡ क्षप꣢꣯माणो꣣ꣳशु꣢ने꣣त्थ꣢मु꣣ आ꣢द्व꣣न्य꣡था꣢ ॥३०५

कु꣢ । स्थः꣣ । कः꣢ । वा꣣म् । अश्विना । तपानः꣢ । दे꣢वा । म꣡र्त्यः꣢꣯ । घ्न꣣ता꣢ । वा꣣म् । अश्नया꣢ । क्ष꣡प꣢꣯माणः । अं꣣ऽशु꣡ना꣢ । इ꣣त्थ꣢म् । उ꣣ । आ꣢त् । उ꣣ । अन्य꣡था꣢ । अ꣣न् । य꣡था꣢꣯ ॥३०५॥

Mantra without Swara
कुष्ठः को वामश्विना तपानो देवा मर्त्यः । घ्नता वामश्नया क्षपमाणोꣳशुनेत्थमु आद्वन्यथा ॥३०५

कु । स्थः । कः । वाम् । अश्विना । तपानः । देवा । मर्त्यः । घ्नता । वाम् । अश्नया । क्षपमाणः । अंऽशुना । इत्थम् । उ । आत् । उ । अन्यथा । अन् । यथा ॥३०५॥

Samveda - Mantra Number : 305
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 4; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 8;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अश्विना) सूर्य और चन्द्र के समान प्रकाशमान, अज्ञानमय और आध्यात्मिक विभूतियों वाले हे परमेश्वर ! (कुष्ठः) पृथिवीवासी (कः) कौन मनुष्य आपके (वाम्) दोनों स्वरूपों का आह्वान करता है ? (मन्त्र ३०४); (देवा) हे दिव्य प्रकाश वाले परमेश्वर ! जो (मर्त्यः) मनुष्य अपने आपको (तपानः) तपाता है, तपश्चर्या करता है, वह आप का आह्वान करता है । आसुरी भावनाओं का (घ्नता) हनन करने वाली, तथा (अश्मया) पत्थर की तरह पीस देने वाली (अशुना) प्रज्ञानमयी किरण द्वारा, जो उपासक, (इत्थम् क्षयमाणः) आसुरी भावनाओं का इस प्रकार क्षय करता रहता है, (यथा) जैसे कि (आद्वन्) अन्नभोजी व्यक्ति (अश्मया) पत्थर की चक्की द्वारा अन्न को पीसता है वह (वाम्) आप के दोनों स्वरूपों का आह्वान कर सकता है ।
Footnote
[ कुष्ठः = कु (पृथिवी) + स्थः (स्थित) ]