SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 284

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
मो꣡ षु त्वा꣢꣯ वा꣣घ꣡त꣢श्च꣣ ना꣢꣫रे अ꣣स्म꣡न्नि री꣢꣯रमन् । आ꣣रा꣡त्ता꣣द्वा सध꣣मा꣡दं꣢ न꣣ आ꣡ ग꣢ही꣣ह꣢ वा꣣ स꣡न्नुप꣢꣯ श्रुधि ॥२८४॥

मा꣢ । उ꣣ । सु꣢ । त्वा꣣ । वाघ꣡तः꣢ । च꣣ । न꣢ । आ꣣रे꣢ । अ꣣स्म꣢त् । नि । री꣣रमन् । आरा꣡त्ता꣢त् । वा꣣ । सधमा꣡द꣢म् । स꣣ध । मा꣡द꣢꣯म् । नः꣣ । आ꣢ । ग꣣हि । इह꣢ । वा꣣ । स꣢न् । उ꣡प꣢꣯ । श्रु꣣धि ॥२८४॥

Mantra without Swara
मो षु त्वा वाघतश्च नारे अस्मन्नि रीरमन् । आरात्ताद्वा सधमादं न आ गहीह वा सन्नुप श्रुधि ॥

मा । उ । सु । त्वा । वाघतः । च । न । आरे । अस्मत् । नि । रीरमन् । आरात्तात् । वा । सधमादम् । सध । मादम् । नः । आ । गहि । इह । वा । सन् । उप । श्रुधि ॥२८४॥

Samveda - Mantra Number : 284
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 6;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (वाघतः) आप को प्राप्त कराने वाले सांसारिक पदार्थ, (अस्मत) हमसे (त्वा) आपको (आरे) परे (मा उ) न रखें, अपितु ये पदार्थ आपकी (निरीरमन्) आनन्दमयी सत्ता का हमें निरन्तर अनुभव कराते रहें । अभी आप (अस्मत्) हमसे (आरात) दूर से हैं; (तात्) उस दूरी से भी आप (नः) हमारे (सधमादम) परस्पर की प्रसन्नता में (आ गहि) आइये, और (इह वा) यहीं हमारे हृदयों में (सन्) विराजमान होते हुए हमारी स्तुति प्रार्थनाओं को (उप श्रुधि) समीपता से सुनिए ।
Footnote
[ संसार में प्राकृतिक दृढ नियमों द्वारा नियन्ता का, संसार के कार्यत्व की दृष्टि से उसके कर्त्ता का, ज्ञान की दृष्टि से ज्ञानदाता परम गुरु का, तथा कर्मफल की दृष्टि से न्यायकारी परमेश्वर का, और सांसारिक पदार्थों द्वारा अनूभूत सुखमयी भावनाओं द्वारा परमेश्वर के आनन्दमय स्वरूप का भान होता है । इस प्रकार सांसारिक पदार्थ भी अपनी सत्ता द्वारा परमेश्वर की सत्ता का बोध कराते हैं । ]
[वाघतः = वह, (प्रापणे) । आरात् = तद् दूरे तद्वन्तिके (यजु० ४०। ५) ]