SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 267

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेध आङ्गिरसः Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
श्रा꣡य꣢न्त इव꣣ सू꣢र्यं꣣ वि꣡श्वेदिन्द्र꣢꣯स्य भक्षत । व꣡सू꣢नि जा꣣तो꣡ जनि꣢꣯मा꣣न्यो꣡ज꣢सा꣣ प्र꣡ति꣢ भा꣣गं꣡ न दी꣢꣯धिमः ॥२६७॥

श्रा꣡य꣢꣯न्तः । इ꣣व । सू꣡र्य꣢꣯म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । इ꣡न्द्र꣢꣯स्य । भ꣣क्षत । व꣡सू꣢꣯नि । जा꣣तः꣢ । ज꣡नि꣢꣯मानि । ओ꣡ज꣢꣯सा । प्र꣡ति꣢꣯ । भा꣣ग꣢म् । न । दी꣣धिमः ॥२६७॥

Mantra without Swara
श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जातो जनिमान्योजसा प्रति भागं न दीधिमः ॥

श्रायन्तः । इव । सूर्यम् । विश्वा । इत् । इन्द्रस्य । भक्षत । वसूनि । जातः । जनिमानि । ओजसा । प्रति । भागम् । न । दीधिमः ॥२६७॥

Samveda - Mantra Number : 267
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे मनुष्यो ! जैसे तुम (सूर्यम्) सूर्य का (श्रायन्तः) आश्रय लेते हुए सूर्य के ताप और प्रकाश का सभी भोग करते हो, वैसे ही तुम सब मिलकर (इन्द्रस्य) परमेश्वर की दी (विश्वा) सब (वसूनि) सम्पत्तियों का, जो सम्पत्तियाँ कि (जाता उ) उत्पन्न हुई हैं, तथा (जनिमानि) जो उत्पन्न होंगी, - (भक्षत) भोग किया करो, ताकि तुम सब (ओजसा) ओज से सम्पन्न हो सको । (न) जैसे कि सन्तानें पिता मे प्राप्त (प्रति) अपने अपने (भागम्) दायभाग का भोग तथा उसका (दीधिमः) धारण करती हैं वैसे ही हम सब भी परमात्म-पिता से प्राप्त प्रतिनियत सम्पत्तियों का भोग तथा (दीघमः) धारण किया करें ।
Footnote
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