SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 257

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- नृमेधपुरुमेधावाङ्गिरसौ Chhand- बृहती Swara- मध्यमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣢ व꣣ इ꣡न्द्रा꣢य बृह꣣ते꣡ मरु꣢꣯तो꣣ ब्र꣡ह्मा꣢र्चत । वृ꣣त्र꣡ꣳ ह꣢नति वृत्र꣣हा꣢ श꣣त꣡क्र꣢तु꣣र्वज्रेण श꣣त꣡प꣢र्वणा ॥२५७॥

प्र꣢ । वः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । बृ꣣हते꣢ । म꣡रु꣢꣯तः । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । अ꣣र्चत । वृत्र꣢म् । ह꣢नति । वृत्रहा꣢ । वृ꣣त्र । हा꣢ । श꣣त꣡क्र꣢तुः । श꣣त꣢ । क्र꣣तुः । व꣡ज्रे꣢꣯ण । श꣣त꣡प꣢र्वणा । श꣣त꣢ । प꣣र्वणा ॥२५७॥

Mantra without Swara
प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत । वृत्रꣳ हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा ॥

प्र । वः । इन्द्राय । बृहते । मरुतः । ब्रह्म । अर्चत । वृत्रम् । हनति । वृत्रहा । वृत्र । हा । शतक्रतुः । शत । क्रतुः । वज्रेण । शतपर्वणा । शत । पर्वणा ॥२५७॥

Samveda - Mantra Number : 257
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 3; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(मरुतः) हे मितभाषी तथा प्राणायाम के अभ्यासी उपासको ! (वः) तुम्हारा उपासनीय जो (इन्द्राय) परमेश्वर है, जो कि (बृहते) महान है, उसके प्रति (ब्रह्म) ब्रह्म-सम्बन्धी सामगानों को (प्र अर्चत) भक्ति-पूर्वक अर्चनारूप में भेंट किया करो । वह (वृत्रहा) पाप और अज्ञान का नाशक परमेश्वर (वृत्रम्) पापऔर-अज्ञानरूपी वृत्रों का (हनति) हनन करता है। वह (वज्रेण) ज्ञान-प्रदान रूपी वज्र के द्वारा पापों-और-प्रज्ञानों का हनन करता है । यह ज्ञान रूपी वज्र (शतपर्वणा) सैंकड़ों धाराओं वाले वज्र के समान है। वह परमेश्वर (शतक्रतुः) सैकड़ों प्रकार के कर्मों, संकल्पों, तथा अज्ञान वाला है ।
Footnote
[ मरुतः = ऋत्विजः (निघं० ३। १८), अर्थात् उपासना-यज्ञ के ऋत्विक् ॥ मरुतः = मा + रुतः । मितराविणः (निरु० ११। २। १३) ]