SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 220

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ नो꣢ मित्रावरुणा घृ꣣तै꣡र्गव्यू꣢꣯तिमुक्षतम् । म꣢ध्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि सुक्रतू ॥२२०॥

आ꣢ । नः꣣ । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः꣢ । ग꣡व्यू꣢꣯तिम् । गो । यू꣣तिम् । उक्षतम् । म꣡ध्वा꣢꣯ । र꣡जाँ꣢꣯सि । सु꣣क्रतू । सु । क्रतूइ꣡ति꣢ ॥२२०॥

Mantra without Swara
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम् । मध्वा रजाꣳसि सुक्रतू ॥

आ । नः । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः । गव्यूतिम् । गो । यूतिम् । उक्षतम् । मध्वा । रजाँसि । सुक्रतू । सु । क्रतूइति ॥२२०॥

Samveda - Mantra Number : 220
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(मित्रा) स्नेह करने वाला तथा (वरुणा) पापों और अज्ञानावरण का निवारण करने वाला परमेश्वर, (नः) हम उपासकों के (गव्यूतिम्) ऐन्द्रियक-मार्गों को (घृतैः) प्रकाशों द्वारा (उक्षतम्) सींचे, और अपने (मध्वा) मधुर प्रकाश द्वारा (रजांसि) सब लोकों को सींचे । मित्र और वरुण रूपों वाला परमात्मा (सुक्रतू) उपासकों के कर्मों तथा संकल्पों को उत्तम बना देता है ।
Footnote
[“मित्रावरुणा” में द्विवचन है । इस द्वारा परमेश्वर के दो रूपों को सूचित किया गया है। घृतैः= घृ क्षरणदीप्तयोः । ]