SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 210

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
धा꣣ना꣡व꣢न्तं कर꣣म्भि꣡ण꣢मपू꣣प꣡व꣢न्तमु꣣क्थि꣡न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢ प्रा꣣त꣡र्जु꣢षस्व नः ॥२१०॥

धा꣣ना꣡व꣢न्तम् । क꣣रम्भि꣡ण꣢म् । अ꣣पूप꣡व꣢न्तम् । उ꣣क्थि꣡न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । प्रा꣣तः꣢ । जु꣣षस्व । नः ॥२१०॥

Mantra without Swara
धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम् । इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः ॥

धानावन्तम् । करम्भिणम् । अपूपवन्तम् । उक्थिनम् । इन्द्र । प्रातः । जुषस्व । नः ॥२१०॥

Samveda - Mantra Number : 210
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(धानावन्तम्) जिसके पास धनधान्य प्रभूत मात्रा में हैं, और (करम्भिणम्) जिसके पास सत्तू और दही आदि पदार्थ प्रभूत मात्रा में हैं, तथा (अपूपवन्तम्) जिसके पास मालपूआ आदि पदार्थ प्रभूत मात्रा में हैं, - ऐसे व्यक्ति को जैसे याचक लोग चाहना से प्राप्त होते हैं, तथा (उक्थिनम्) जो आचार्य वैदिक सूक्तों का पण्डित है उसे जैसे ब्रह्मचारी लोग चाहना से प्राप्त होते हैं, ऐसे ही (इन्द्र) हे परमेश्वर ! आप भक्तिरस की चाहना वाले होकर (नः) हमें (प्रातः) प्रातः कालः की उपासनाम्रों में (जुषस्व) प्रेम से प्राप्त हूजिये ।
Footnote
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