SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1872

1871 Mantra
Devata- संग्रामशिषः Rishi- पायुर्भारद्वाजः Chhand- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यो꣢ नः꣣ स्वो꣡ऽर꣢णो꣣ य꣢श्च꣣ नि꣢ष्ट्यो꣣ जि꣡घा꣢ꣳसति । दे꣣वा꣡स्तꣳ सर्वे꣢꣯ धूर्वन्तु꣣ ब्र꣢ह्म꣣ व꣢र्म꣣ ममान्त꣢꣯र꣣ꣳ श꣢र्म꣣ व꣢र्म꣣ म꣡मा꣢न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥

यः꣢ । नः꣣ । स्वः꣢ । अ꣡रणः꣢꣯ । यः । च꣣ । नि꣡ष्ट्यः꣢꣯ । जि꣡घा꣢꣯ꣳसति । दे꣣वाः꣢ । तम् । स꣡र्वे꣢꣯ । धू꣣र्वन्तु । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । व꣡र्म꣢꣯ । म꣡म꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯रम् । श꣡र्म꣢꣯ । व꣡र्म꣢꣯ । म꣡म꣢꣯ । अ꣡न्त꣢꣯रम् ॥१८७२॥

Mantra without Swara
यो नः स्वोऽरणो यश्च निष्ट्यो जिघाꣳसति । देवास्तꣳ सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरꣳ शर्म वर्म ममान्तरम् ॥

यः । नः । स्वः । अरणः । यः । च । निष्ट्यः । जिघाꣳसति । देवाः । तम् । सर्वे । धूर्वन्तु । ब्रह्म । वर्म । मम । अन्तरम् । शर्म । वर्म । मम । अन्तरम् ॥१८७२॥

Samveda - Mantra Number : 1872
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो (अरणः) आसुर-शत्रु अर्थात् कामक्रोध आदि (स्वः) हमारा निज-उपार्जित है, (यः च) और जो (निष्टयः) बाहर का है, माता-पिता आदि द्वारा हमें प्राप्त हुआ है. इनमें से जो भी (नः) हम उपासकों की (जिघांसति) हिंसा करने को उन्मुख है, (सर्वे देवाः) हमारी उपार्जित सब दिव्यशक्तियां (तम्) उस आसुर-शत्र की (धूर्वन्तु) हिंसा कर दें । इस निमित्त (ब्रह्म) वेद-तथा-परमेश्वर (मम) हम प्रत्येक उपासक की (आन्तरम्) अभ्यन्तर (वर्म) कवच हो, तथा (शर्म) ब्रह्मानन्दरस की प्राप्ति (मम) हम प्रत्येक उपासक की (आन्तरम्) आभ्यन्तर (वर्म) कवच हो ।
Footnote
[ अरणः = अरमणीयः । अथवा “ऋ” (रेषणे) । अथवा अ + रण (शब्दे) = अवघम् (पापम्) । आन्तरं वर्म = राजनैतिक युद्ध में कवच लोहे की होती है, शोर शरीर के बाहर भाग पर पहनी जाती है । परन्तु मन्त्र में यह कवच ब्राह्मी कही है, और आभ्यन्तर कवच है । ब्राह्मी कवच का अभिप्राय है वेद और परमेश्वर रूपी कवच । वेद का श्रवण और वैदिकभावनाओं का मनन, तथा परमेश्वर के निज “ओ३म्” नाम का निरन्तर जाप । यह ब्राह्मीकवच ऐन्द्रियिक शक्तियों, मन, और बुद्धि की है, आभ्यन्तर कवच है । इस ब्राह्मी कवच के रहते, पाप, इन आभ्यन्तर तत्त्वों पर प्रभावशून्य हो जाते हैं । इस प्रकार यह समग्र प्रकरण आध्यात्मिक-युद्ध का वर्णन करता है । सामवेद उपासना का वेद है । उपासना का वर्णन करते हुए उपसंहार में राजनैतिक युद्ध का वर्णन असामयिक प्रतीत होता है । अतः उपसंहार में आध्यात्मिक युद्ध का ही वर्णन समझना चाहिये ]