SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1864

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अप्रतिरथ ऐन्द्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क꣣ङ्काः꣡ सु꣢प꣣र्णा꣡ अनु꣢꣯ यन्त्वेना꣣न्गृ꣡ध्रा꣢णा꣣म꣡न्न꣢म꣣सा꣡वस्तु꣣ से꣡ना꣢ । मै꣡षां꣢ मोच्यघहा꣣र꣢श्च꣣ ने꣢न्द्र꣣ व꣡या꣢ꣳस्येनाननु꣣सं꣡य꣢न्तु꣣ स꣡र्वा꣢न् ॥१८६४

क꣣ङ्काः꣢ । सु꣣प꣢र्णाः । सु꣣ । पर्णाः꣢ । अ꣡नु꣢꣯ । य꣣न्तु । एनान् । गृ꣡ध्रा꣢꣯णाम् । अ꣡न्न꣢꣯म् । अ꣣सौ꣢ । अ꣣स्तु । से꣡ना꣢꣯ । मा । ए꣣षाम् । मोचि । अघहारः꣢ । अ꣣घ । हारः꣢ । च꣣ । न꣢ । इ꣣न्द्र । व꣡या꣢꣯ꣳसि । ए꣣नान् । अ꣣नु꣡संय꣢न्तु । अ꣣नु । सं꣡य꣢꣯न्तु । स꣡र्वा꣢꣯न् ॥१८६४॥

Mantra without Swara
कङ्काः सुपर्णा अनु यन्त्वेनान्गृध्राणामन्नमसावस्तु सेना । मैषां मोच्यघहारश्च नेन्द्र वयाꣳस्येनाननुसंयन्तु सर्वान् ॥१८६४

कङ्काः । सुपर्णाः । सु । पर्णाः । अनु । यन्तु । एनान् । गृध्राणाम् । अन्नम् । असौ । अस्तु । सेना । मा । एषाम् । मोचि । अघहारः । अघ । हारः । च । न । इन्द्र । वयाꣳसि । एनान् । अनुसंयन्तु । अनु । संयन्तु । सर्वान् ॥१८६४॥

Samveda - Mantra Number : 1864
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(कङ्काः) बगुले, (सुपर्णाः) मुर्गे आदि, (एनान्) इन आसुरी-कर्मों में (अनु) निरन्तर (यन्तु) लगे रहते हैं । (असौ) वह (सेना) आसुरी-सेना (गृध्राणाम्) गीघों का (अन्नम् अस्तु) अन्न होता है । (एषाम्) इन आसुरी-सैनिकों में से कोई भी (मा मोचि) नाश से मुक्त न हो, (अधहारः च) इनमें से जो भी हमें पाप की ओर खींच कर ले जाता है वह (न) नाश से मुक्त न हो । (इन्द्र) हे परमेश्वर (वयाँसि) कौएं आदि (एनान्) इन आसुरी-कर्मों में (अनु) निरन्तर (सं यन्तु) पूर्णरूप से लगे रहते हैं ।
Footnote
[ कङ्क, सुपर्ण, गृध्र और वयाँसि, — ये अपनी-अपनी विशिष्ट आसुरी-वृत्तियों या आसुरी-कर्मों के निर्देशक हैं । “कङ्क” का अर्थ है “बगुले” । जो बाहिर से तो धर्मात्मा प्रतीत होता हो, और भीतर से छली-कपटी हो, उसे बगुला-भक्त कहते हैं । ये दूसरों को हितैषी होने का विश्वास दिला कर अन्त में उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं । यह बगुला-वृत्ति आसुरी-वृत्ति है । सुपर्ण का अर्थ “मुर्गा” भी है। मुर्गे को कुक्कुट भी कहते हैं । कुक्कुटी-वृत्ति के लिये । आपटे ने Hypoceiry तथा Interested observance of religous rites लिखा है । अर्थात् पाखण्ड, और लाभ-भावना से धर्मकृत्य करना । गृध्र अर्थात् गीध, गर्घा अर्थात् अतिलोभ का सूचक है । वयांसि प्रर्थात् कोएं, चालाकी, आंख बचा कर परद्रव्यापहरण, केवल खाने-पीने के लिये देर तक जीवित रहना आदि के सूचक हैं । ये और ऐसी दुर्वृत्तियाँ पशु-पक्षियों की होती हैं । उपासकों को इन दुवतियों को सर्वथा त्याग देना चाहिये, और इस निमित्त परमेश्वरीय सहायता की प्रार्थना करते रहना चाहिये ]