SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1851

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अप्रतिरथ ऐन्द्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स꣡ इषु꣢꣯हस्तैः꣣ स꣡ नि꣢ष꣣ङ्गि꣡भि꣢र्व꣣शी꣡ सꣳस्र꣢꣯ष्टा꣣ स꣢꣫ युध꣣ इ꣡न्द्रो꣢ ग꣣णे꣡न꣢ । स꣣ꣳसृष्टजि꣡त्सो꣢म꣣पा꣡ बा꣢हुश꣣र्ध्यू꣢३꣱ग्र꣡ध꣢न्वा꣣ प्र꣡ति꣢हिताभि꣣र꣡स्ता꣢ ॥१८५१॥

सः । इ꣡षु꣢꣯हस्तैः । इ꣡षु꣢꣯ । ह꣣स्तैः । सः꣢ । नि꣣षङ्गि꣡भिः꣢ । नि꣣ । सङ्गि꣡भिः꣢ । व꣣शी꣢ । स꣡ꣳस्र꣢꣯ष्टा । सम् । स्र꣣ष्टा । सः꣢ । यु꣡धः꣢꣯ । इ꣡न्द्रः꣢꣯ । ग꣣णे꣡न꣢ । स꣣ꣳसृष्टजि꣢त् । स꣣ꣳसृष्ट । जि꣢त् । सो꣡मपाः꣢ । सो꣣म । पाः꣢ । बा꣣हुश꣢र्द्धी । बा꣣हु । श꣢र्द्धी । उ꣣ग्र꣡ध꣢न्वा । उ꣣ग्र꣢ । ध꣣न्वा । प्र꣡ति꣢꣯हिताभिः । प्र꣡ति꣢꣯ । हि꣣ताभिः । अ꣡स्ता꣢꣯ ॥१८५१॥१

Mantra without Swara
स इषुहस्तैः स निषङ्गिभिर्वशी सꣳस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन । सꣳसृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्यू३ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता ॥

सः । इषुहस्तैः । इषु । हस्तैः । सः । निषङ्गिभिः । नि । सङ्गिभिः । वशी । सꣳस्रष्टा । सम् । स्रष्टा । सः । युधः । इन्द्रः । गणेन । सꣳसृष्टजित् । सꣳसृष्ट । जित् । सोमपाः । सोम । पाः । बाहुशर्द्धी । बाहु । शर्द्धी । उग्रधन्वा । उग्र । धन्वा । प्रतिहिताभिः । प्रति । हिताभिः । अस्ता ॥१८५१॥१

Samveda - Mantra Number : 1851
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
जैसे (सः इन्द्रः) वह सम्राट् (इषुहस्तैः) इषुधारी तथा (निषङ्गिभिः) खङ्गधारी योद्धाओं द्वारा (वशी) शत्रुओं को वश में करता, और (सः) वह सम्राट् (युधः) युद्धकारी शत्रुओं के (गणेन) गणों के साथ (सं स्रष्टा) स्वयं भी भिड़ जाता है, (संसृष्टजित्) और भिड़ कर उन पर विजय पा लेता है, तथा (बाहुशर्धी) बाहुबलशाली और (उग्रधन्वा) उग्रधनुष्धारी वह सम्राट् (प्रति हिताभिः) शत्रुओं की ओर प्रेरित हुई सेनाओं द्वारा (अस्ता) शत्रुओं को परास्त कर देता है और (सोमपाः) सोभ्य प्रकृति प्रजा की रक्षा करता है, वैसे ही (सः इन्द्रः) जगत् का सम्राट् वह परमेश्वर (इषुहस्तैः) प्रबल-इच्छा रूपी-बाणधारी तथा (निषङ्गिभिः) असङ्गरूपी खड्गधारी सन्तों, महात्माओं, योगिजनों द्वारा, (वशी) उपासकों के कामक्रोध आदि शत्रुओं को (वशी) नियन्त्रित करता है, और (सः) वह परमेश्वर स्वयं भी (युधः) युद्धकारी काम-क्रोध आदि के (गणेन) गणों के साथ (सं स्रष्टा) भिड़ जाता है, और (संसृष्टजित्) भिड़े हुए इन शत्रुओं पर विजय पा लेता है, (बाहुशर्धी) बहु बलशाली तथा (उग्रधन्वा) उग्र प्रणव-धनुष वाला परमेश्वर, (प्रति हिताभिः) प्रेषित-सन्तों आदि की सेनाओं द्वारा (अस्ता) उपासकों के काम-क्रोध आदि शत्रुओं को परास्त कर (सोमपाः) भक्तिरस सम्पन्न तथा सौम्यप्रकृति उपासकों की रक्षा करता है ।
Footnote
[ वैदिक साहित्य में इष् तथा धनुष का अप्राकृतिक स्वरूप भी माना है । यथाः—ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवेत्ता की जिह्वा की ज्या, हृदय-बल को धनुष कहा है (अथवं० ५। १८। ८) ; इसी प्रकार ब्राह्मण की वाणी को घोरा-इषु कहा है (अथर्व० ५। १८। १५) । इसी प्रकार प्रणव अर्थात् ओ३म् को धनुष् तथा जीवात्मा को शर अर्थात् इषु कहा है (मुण्डक २। २। ४) । तथा कामवासना को भी इषु माना है जिस द्वारा काम हृदय को बींधता है (अथर्व० ३। २५। १) ; काम का इषु प्लीहा (spleen) को सुखा देता है । (अथर्व० ३। २५। ३) । इषुहस्तैः = जिनके हाथों में मानो मनोबल है, प्रबल इच्छा-शक्ति का बल है ]