SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1849

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- अप्रतिरथ ऐन्द्रः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ꣣शुः꣡ शिशा꣢꣯नो वृष꣣भो꣢꣫ न भी꣣मो꣡ घ꣢नाघ꣣नः꣡ क्षोभ꣢꣯णश्चर्षणी꣣ना꣢म् । स꣣ङ्क्र꣡न्द꣢नोऽनिमि꣣ष꣡ ए꣢कवी꣣रः꣢ श꣣त꣢ꣳ सेना꣢꣯ अजयत्सा꣣क꣡मिन्द्रः꣢꣯ ॥१८४९॥

आ꣣शुः꣢ । शि꣡शा꣢꣯नः । वृ꣣षभः꣢ । न । भी꣣मः꣢ । घ꣣नाघनः꣢ । क्षो꣡भ꣢꣯णः । च꣣र्षणीना꣢म् । सं꣣क्र꣡न्द꣢नः । स꣣म् । क्र꣡न्द꣢꣯नः । अ꣣निमिषः꣢ । अ꣢ । निमिषः꣢ । ए꣣कवीरः꣢ । ए꣣क । वीरः꣢ । श꣣त꣢म् । से꣡नाः꣢꣯ । अ꣣जयत् । साक꣢म् । इ꣡न्द्रः꣢꣯ ॥१८४९॥

Mantra without Swara
आशुः शिशानो वृषभो न भीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणीनाम् । सङ्क्रन्दनोऽनिमिष एकवीरः शतꣳ सेना अजयत्साकमिन्द्रः ॥

आशुः । शिशानः । वृषभः । न । भीमः । घनाघनः । क्षोभणः । चर्षणीनाम् । संक्रन्दनः । सम् । क्रन्दनः । अनिमिषः । अ । निमिषः । एकवीरः । एक । वीरः । शतम् । सेनाः । अजयत् । साकम् । इन्द्रः ॥१८४९॥

Samveda - Mantra Number : 1849
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 21; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रः) परमेश्वर (आशुः) सर्वत्र व्याप्त है, और शीघ्र फलदाता है । (शिशानः) परमेश्वर पाप-वृत्रों के विनाश के लिये उपासकों को उग्र बनाता (वृषभो न) तीक्ष्ण सींगों वाले बैल के सदृश (भीमः) पापियों के लिये भयानक, (धनाधनः) अतिशय रूप में पापों का हनन करने वाला, (चर्षणीनाम्) पापी-जनों में (क्षोभणः) क्षोभोत्पादक, (संक्रन्दनः) पापियों को रुलाने वाला, (अनिमिषः) शासन में सदा जागरूक, (एकवीरः) सर्वाधिक वीर, तथा पापों की (शतं सेनाः) सैकड़ों सेनाओं पर (साकम्) एक साथ (अजयत्) विजय पा लेता है ।
Footnote
[ यद्यपि १८४९ से लेकर १८७५ तक के मन्त्र, स्पष्टतया, राजनैतिक युद्ध का वर्णन करते हुए प्रतीत होते हैं, तो भी इन में अन्तर्निहित आध्यात्मिक भावना ही है । देवासुर संग्राम, आध्यात्मिक-आन्तरिक युद्धों के लिये, वैदिक साहित्य में यत्रतत्र वर्णित है, और इस युद्ध में विजय पाने के लिये उपासक के निज-मनोबल, और उपासना द्वारा परमेश्वरीय कृपा की आवश्यकता होती है; देखो, मन्त्र १८७२ ]