SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1846

1871 Mantra
Devata- वेनः Rishi- वेनो भार्गवः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ना꣡के꣢ सुप꣣र्ण꣢꣫मुप꣣ य꣡त्पत꣢꣯न्तꣳ हृ꣣दा꣡ वेन꣢꣯न्तो अ꣣भ्य꣡च꣢क्षत त्वा । हि꣡र꣢ण्यपक्षं꣣ व꣡रु꣢णस्य दू꣣तं꣢ य꣣म꣢स्य꣣ यो꣡नौ꣢ शकु꣣नं꣡ भु꣢र꣣ण्यु꣢म् ॥१८४६॥

ना꣡के꣢꣯ । सु꣣पर्ण꣢म् । सु꣣ । पर्ण꣢म् । उ꣡प꣢꣯ । यत् । प꣡त꣢꣯न्तम् । हृ꣣दा꣢ । वे꣡न꣢꣯न्तः । अ꣣भ्य꣡चक्षत । अ꣣भि । अ꣣च꣢꣯क्षत । त्वा꣣ । हि꣡र꣢꣯ण्यपक्षम् । हि꣡र꣢꣯ण्य । प꣣क्षम् । व꣡रु꣢꣯ण्स्य । दू꣣त꣢म् । य꣣म꣡स्य꣢ । यो꣡नौ꣢꣯ । श꣣कुन꣢म् । भु꣣रण्यु꣢म् ॥१८४६॥

Mantra without Swara
नाके सुपर्णमुप यत्पतन्तꣳ हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा । हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम् ॥

नाके । सुपर्णम् । सु । पर्णम् । उप । यत् । पतन्तम् । हृदा । वेनन्तः । अभ्यचक्षत । अभि । अचक्षत । त्वा । हिरण्यपक्षम् । हिरण्य । पक्षम् । वरुण्स्य । दूतम् । यमस्य । योनौ । शकुनम् । भुरण्युम् ॥१८४६॥

Samveda - Mantra Number : 1846
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (हृदा) हृदय से (वेनन्तः) आप की कामना करते हुए उपासक, (नाके) दुःख-रहित आनन्दमयी अवस्था में, (त्वा) आप का (अभि अचक्षत) प्रत्यक्ष दर्शन कर लेते हैं । उस आप का दर्शन कर लेते जो आप कि (उप) उपासना में (पतन्तम्) उपासकों के हृदयाकाशों में मानो उड़ानें ले रहे होते हैं, जो आपकि (हिरण्यपक्षम्) सुवर्णवर्णी सूर्यनक्षत्र आदि के मानो पंखरूप हैं, अर्थात् जिस आप की सहायता से ये मानो आकाश में उड़ से रहे हैं, जो आप कि (वरुणस्य) आवरण करने वाली अज्ञान रात्रि के (दूतम्) परितापक हैं, जो आप कि (यमस्य) यमनियमों का पालन करने वाले, इन्द्रियों और मन के नियन्ता, उपासक के (योनौ) हृदय-गृह में रहते हुए (शकुनम्) उसे शक्तिप्रदान करते हैं, तथा (भुरण्युम्) उसका भरण-पोषण करते हैं ।
Footnote
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