SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1841

1871 Mantra
Devata- वायुः Rishi- उलो वातायनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
उ꣣त꣡ वा꣢त पि꣣ता꣡सि꣢ न उ꣣त꣢꣫ भ्रातो꣣त꣢ नः꣣ स꣡खा꣢ । स꣡ नो꣢ जी꣣वा꣡त꣢वे कृधि ॥१८४१॥

उ꣣त꣢ । वा꣢त । पिता꣢ । अ꣣सि । नः । उत꣢ । भ्रा꣡ता꣢꣯ । उ꣣त꣢ । नः꣣ । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । सः꣢ । नः꣣ । जीवा꣡त꣢वे । कृ꣣धि ॥१८४१॥

Mantra without Swara
उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा । स नो जीवातवे कृधि ॥

उत । वात । पिता । असि । नः । उत । भ्राता । उत । नः । सखा । स । खा । सः । नः । जीवातवे । कृधि ॥१८४१॥

Samveda - Mantra Number : 1841
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(उत) और (वात) हे सर्वगत, अविद्यानाशक प्राणाधार परमेश्वर ! आप (नः) हमारे (पिता असि) पिता हैं, रक्षक और पालक हैं, (उत) और (नः) हमारे (भ्राता) भाई हैं, भरण-पोषण करने वाले हैं, (सखा) तथा चेतनरूप से समानख्याति वाले मित्र हैं । (सः) वह आप (नः) हमें (जीवातवे) जीवन के लिये (कृषि) समर्थ कीजिये ।
Footnote
[ वात चिकित्सा की दृष्टि से शुद्धवायु तथा प्राणायाम, व्यक्ति की रक्षा, पालन, भरण-पोषण करते तथा मित्रवत् हितकारी हैं ]