SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1840

1871 Mantra
Devata- वायुः Rishi- उलो वातायनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
वा꣢त꣣ आ꣡ वा꣢तु भेष꣣ज꣢ꣳ श꣣म्भु꣡ म꣢यो꣣भु꣡ नो꣢ हृ꣣दे꣢ । प्र꣢ न꣣ आ꣡यू꣢ꣳषि तारिषत् ॥१८४०॥

वा꣡तः꣢꣯ । आ । वा꣣तु । भेष꣢जम् । श꣣म्भु꣢ । श꣣म् । भु꣢ । म꣣योभु꣢ । म꣣यः । भु꣢ । नः꣣ । हृदे꣢ । प्र । नः꣣ । आ꣡यू꣢꣯ꣳषि । ता꣣रिषत् ॥१८४०॥

Mantra without Swara
वात आ वातु भेषजꣳ शम्भु मयोभु नो हृदे । प्र न आयूꣳषि तारिषत् ॥

वातः । आ । वातु । भेषजम् । शम्भु । शम् । भु । मयोभु । मयः । भु । नः । हृदे । प्र । नः । आयूꣳषि । तारिषत् ॥१८४०॥

Samveda - Mantra Number : 1840
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(वातः) सर्वगत तथा अविद्यानाशक परमेश्वर (भेषजम्) ऐसी महौषध (आ वातु) हमें प्रदान करे जो कि हमें (शम्भु) शान्तिप्रदान करे और जो (नः) हमारे (हृदे) हृदयों के लिये (मयोभु) सुख प्रदान करे, और (नः) हमारी (आयूँषि) आयुओं को (प्र तारिषत्) बढ़ाए ।
[ भेषजम् = आध्यात्मिक दृष्टि से यह महौषध है “परमेश्वरीय-आनन्दरस” । वातः = गतो, गन्धने (विनाशने) ]
अथवा
वातचिकित्सा अर्थात् शुद्धवायु का सेवन तथा प्राणायाम की दृष्टि से :-
हे परमेश्वर ! आप की कृपा से (वातः) वायु हमारे लिये (भेषजम्) औषघ (आ वातु) बहा लाए, जो औषध कि (नः) हमारे (हृदे) हृदयों के लिये (शम्भु) शान्ति पैदा करने वाली हो, तथा (मयोभु) सुख पैदा करने वाली हो, और जो (नः) हमारी (आयूंषि) आयुओं को (प्र तारिषत्) बढ़ाए ।
Footnote
[ वायु महौषध लाती है आक्सिजन (oxygen) के रूप में, जो कि रक्त को शुद्ध करती और आयु को बढ़ाती है ]