SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1839

1871 Mantra
Devata- आपः Rishi- त्रिशिरास्त्वाष्ट्रः सिन्धुद्वीप आम्बरीषो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣢स्मा꣣ अ꣡रं꣢ गमाम वो꣣ य꣢स्य꣣ क्ष꣡या꣢य꣣ जि꣡न्व꣢थ । आ꣡पो꣢ ज꣣न꣡य꣢था च नः ॥१८३९॥

त꣡स्मै꣢꣯ । अ꣡र꣢꣯म् । ग꣣माम । वः । य꣡स्य꣢꣯ । क्ष꣡या꣢꣯य । जि꣡न्व꣢꣯थ । आ꣡पः꣢꣯ । ज꣣न꣡य꣢थ । च꣣ । नः ॥१८३९॥

Mantra without Swara
तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ । आपो जनयथा च नः ॥

तस्मै । अरम् । गमाम । वः । यस्य । क्षयाय । जिन्वथ । आपः । जनयथ । च । नः ॥१८३९॥

Samveda - Mantra Number : 1839
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(आपः) हे सर्वव्यापक परमेश्वर ! हम उपासकों में (यस्य) जिस आनन्दरस के (क्षयाय) निवास करने के लिये आप हमें (जिन्वथ) प्रसन्न तथा सन्तुष्ट रखते हैं, (तस्मै) उस आनन्दरस की प्राप्ति के लिये हम (वः) आप को (अरङ्गमाम्) पूर्णतया प्राप्त होते हैं । (नः) आप हमें (जनयथ) नया आध्यात्मिक-जन्म दीजिये, आध्यात्मिक दृष्टि से आप हमें द्विजन्मा बनाइये ।
Footnote
[ जलचिकित्सा की दृष्टि से “क्षयाय” का अर्थ है रोगक्षय, रोगविनाश । तथा “जनयथ” का अर्थ है जननशक्ति का प्रदान, अर्थात् नपुंसकता का विनाश ]