SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1834

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
य꣡दि꣢न्द्रा꣣हं꣢꣫ यथा꣣ त्वमीशी꣢꣯य꣣ व꣢स्व꣣ ए꣢क꣢ इ꣢त् । स्तो꣣ता꣢ मे꣣ गो꣡स꣢खा स्यात् ॥१८३४॥

य꣢त् । इ꣣न्द्र । अ꣣ह꣢म् । य꣡था꣢꣯ । त्वम् । ई꣡शी꣢꣯य । व꣡स्वः꣢꣯ । ए꣡कः꣢꣯ । इत् । स्तो꣣ता꣢ । मे꣣ । गो꣡स꣢꣯खा । गो । स꣣खा । स्यात् ॥१८३४॥

Mantra without Swara
यदिन्द्राहं यथा त्वमीशीय वस्व एक इत् । स्तोता मे गोसखा स्यात् ॥

यत् । इन्द्र । अहम् । यथा । त्वम् । ईशीय । वस्वः । एकः । इत् । स्तोता । मे । गोसखा । गो । सखा । स्यात् ॥१८३४॥

Samveda - Mantra Number : 1834
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्र) हे ऐश्वर्यशाली परमेश्वर ! (यथा) जैसे (त्वम्) आप (एक इत्) अकेले ही (वस्वः) आध्यात्मिक और सांसारिक सम्पत्तियों के अधीश्वर हैं, वैसे (अहम्) मैं उपासक भी (यद्) यदि सम्पत्तियों का अकेला ही (ईशीय) अधीश्वर हो जाऊँ, तो (मे) मेरा स्तोता (गोसखा) वेदों और वैदिक भावनाओं का सखा (स्यात्) हो जाय ।
Footnote
[ उपासक उपासना में चिरकाल से लगा हुआ है, परन्तु वेद और वैदिकभावनाओं के प्रति अभी तक उसमें उग्र-श्रद्धा उत्पन्न नहीं हुई, क्योंकि इस सम्बन्ध में वह अभी तक परमेश्वरीय-कृपा का पात्र नहीं बन पाया। इसलिये परमेश्वर के प्रति उपासक एक प्रकार से शिकायत सी कर रहा है । गोः = वाक् (निघं० १। ११) । गोसखा का भाव निम्नलिखित मन्त्र द्वारा स्पष्ट होता हैं । यथाः—यस्तित्याज सचिविंद सखायं न तस्य वाच्यपि भागो अस्ति । यदीं शृणोत्यलकं शृणोति न स प्र वेद सुकृतस्य पन्थाम् ॥ (ऋ० १०। ७१। ६) । इस मन्त्र में वेद को सखा, तथा साथी को पहिचानने वाला कहा है । जब तक मनुष्य वेद का सखा नहीं बनता, तब तक वह वेद के रहस्यार्थों को नहीं जान सकता, और न उसमें वेद और वैदिक भावनाओं के प्रति श्रद्धा और निष्ठा ही पैदा हो सकती है । इसके लिये परमेश्वरीय-कृपा की भी आवश्यकता होती है ]