SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 183

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- शुनः शेप आजीगर्तिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣य꣡मु꣢ ते꣣ स꣡म꣢तसि क꣣पो꣡त꣢ इव गर्भ꣣धि꣢म् । व꣢च꣣स्त꣡च्चि꣢न्न ओहसे ॥१८३॥

अ꣣य꣢म् । उ꣣ । ते । स꣢म् । अ꣣तसि । कपो꣡तः꣢ । इ꣣व । गर्भधि꣣म् । ग꣣र्भ । धि꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । तत् । चि꣣त् । नः । ओहसे ॥१८३॥

Mantra without Swara
अयमु ते समतसि कपोत इव गर्भधिम् । वचस्तच्चिन्न ओहसे ॥

अयम् । उ । ते । सम् । अतसि । कपोतः । इव । गर्भधिम् । गर्भ । धिम् । वचः । तत् । चित् । नः । ओहसे ॥१८३॥

Samveda - Mantra Number : 183
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (अयम्) यह उपासक (उ) निश्चय से (ते) आपका है आप इस उपासक के प्रति (सम् अतसि) सदा आते हैं, (इव) जैसे कि (कपोतः) कबूतर, (गर्मधिम्) गर्भ धारण चाहने वाली कबूतरी के प्रति प्राया करता है । और (नः) हमारे (तत् चित् उ वचः) उन प्रार्थना वचनों को आप (ओहसे) स्वीकार करते हैं ।
Footnote
[ कबूतर का कबूतरी की ओर आना कबूतरी की चाहना पर निर्भर होता है । इसी प्रकार उपासक की उग्र अभिलाषा पर परमेश्वर का उपासक की ओर उन्मुख होना निर्भर है ]