SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1826

1871 Mantra
Devata- विश्वे देवाः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣡मृचः꣢꣯ कामयन्ते꣣ यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣢मु꣣ सा꣡मा꣢नि यन्ति । यो꣢ जा꣣गा꣢र꣣ त꣢म꣣य꣡ꣳ सोम꣢꣯ आह꣣ त꣢वा꣣ह꣡म꣢स्मि स꣣ख्ये꣡ न्यो꣢काः ॥१८२६॥

यः꣢ । जा꣣गा꣡र꣢ । तम् । ऋ꣡चः꣢꣯ । का꣢मयन्ते । यः꣢ । जा꣣गा꣡र꣢ । तम् । उ꣣ । सा꣡मा꣢꣯नि । य꣣न्ति । यः꣢ । जा꣣गा꣡र꣢ । तम् । अ꣣य꣢म् । सो꣡मः꣢꣯ । आ꣣ह । त꣡व꣢꣯ । अ꣣ह꣢म् । अ꣣स्मि । सख्ये꣢ । स꣡ । ख्ये꣢ । न्यो꣢काः । नि । ओ꣣काः ॥१८२६॥

Mantra without Swara
यो जागार तमृचः कामयन्ते यो जागार तमु सामानि यन्ति । यो जागार तमयꣳ सोम आह तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः ॥

यः । जागार । तम् । ऋचः । कामयन्ते । यः । जागार । तम् । उ । सामानि । यन्ति । यः । जागार । तम् । अयम् । सोमः । आह । तव । अहम् । अस्मि । सख्ये । स । ख्ये । न्योकाः । नि । ओकाः ॥१८२६॥

Samveda - Mantra Number : 1826
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(यः) जो उपासक अपने कर्तव्यों में (जागार) जागरूक रहता है, सदा कर्तव्यपालन में तत्पर रहता है, (ऋचः) वैदिक मन्त्र (तं कामयन्ते) उसकी कामना करते हैं । (यः) जो उपासक (जागार) अपने कर्तव्यों में जागरूक रहता है, सदा कर्तव्य पालन में तत्पर रहता है, (सामानि) सामगान (तम् उ) उसे ही (यन्ति) प्राप्त होते हैं । (यः) जो उपासक (जागार) अपने कर्तव्यों में जागरूक रहता है, सदा कर्तव्यपालन में तत्पर रहता है (तम्) उसके प्रति (अयं सोमः) यह सर्वप्रेरक-तथा सर्वोत्पादक परमेश्वर मानो (आह) कहता है कि “(अहम्) मैं (तव) तेरे साथ (सख्ये) सखिभाव के निमित्त (न्योकाः) तेरे हृदय गृह में नियतरूप में (अस्मि) रहता हूँ” ।
Footnote
[ अभिप्राय यह है कि ऋचाओं और सामगान द्वारा की गई उपासनाओं का फल उसे ही प्राप्त होता है जोकि अपने इस कर्तव्यपालन में सदा सावधान रहता है, और ऐसे उपासक को परमेश्वर सदा सत्प्रेरणाएं देता रहता है । ]