SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1825

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- अग्निः प्रजापतिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣣ग्नि꣡रिन्द्रा꣢꣯य पवते दि꣣वि꣢ शु꣣क्रो꣡ वि रा꣢꣯जति । म꣡हि꣢षीव꣣ वि꣡ जा꣢यते ॥१८२५

अ꣣ग्निः꣢ । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । प꣣वते । दिवि꣢ । शु꣣क्रः꣢ । वि । रा꣣जति । म꣡हि꣢꣯षी । इ꣣व । वि꣢ । जा꣣यते ॥१८२५॥

Mantra without Swara
अग्निरिन्द्राय पवते दिवि शुक्रो वि राजति । महिषीव वि जायते ॥१८२५

अग्निः । इन्द्राय । पवते । दिवि । शुक्रः । वि । राजति । महिषी । इव । वि । जायते ॥१८२५॥

Samveda - Mantra Number : 1825
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 6;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अग्निः) प्रकाशस्वरूप जगन्नेता (इन्द्राय) इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीवात्मा के लिये, (पवते) क्रियाशील हो रहा है । तथा (शुक्रः) निर्मल प्रकाश वाला जगन्नेता (दिवि) द्युलोक में (विराजति) विराज रहा है, और यही जगन्नेता (महिषी इव) महाशक्ति के रूप में (वि जायते) विविध रूपों में प्रकट हो रहा है।
Footnote
[ पवतेः—समग्र जड़ जगत्, जीवात्माओं के कर्मफलों के अनुसार, जीवात्माओं के अभ्युदय और निःश्रेयस के लिये है । इस प्रकार परमेश्वर जो जगत् में क्रियाशील हो रहा है, इसमें, जीवात्मा की अभ्युन्नति और निःश्रेयस ही प्रेरक हैं ]