SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1819

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- अग्निः पावकः Chhand- सतोबृहती Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ꣣रज्य꣡न्न꣢ग्ने प्रथयस्व ज꣣न्तु꣡भि꣢र꣣स्मे꣡ रायो꣢꣯ अमर्त्य । स꣡ द꣢र्श꣣त꣢स्य꣣ व꣡पु꣢षो꣣ वि꣡ रा꣢जसि पृ꣣ण꣡क्षि꣢ दर्श꣣तं꣡ क्रतु꣢꣯म् ॥१८१९॥

इरज्य꣢न् । अ꣣ग्ने । प्रथयस्व । जन्तु꣡भिः꣢ । अ꣣स्मे꣡इति । रा꣡यः꣢꣯ । अ꣣र्मत्य । अ । मर्त्य । सः꣢ । द꣣र्शत꣡स्य꣢ । व꣡पु꣢꣯षः । वि । रा꣣जसि । पृण꣡क्षि꣢ । द꣡र्शत꣢म् । क्र꣡तु꣢꣯म् ॥१८१९॥

Mantra without Swara
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य । स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि दर्शतं क्रतुम् ॥

इरज्यन् । अग्ने । प्रथयस्व । जन्तुभिः । अस्मेइति । रायः । अर्मत्य । अ । मर्त्य । सः । दर्शतस्य । वपुषः । वि । राजसि । पृणक्षि । दर्शतम् । क्रतुम् ॥१८१९॥

Samveda - Mantra Number : 1819
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अगर्त्य अग्ने) हे अमर जगन्नेता ! (जन्तुभिः) जन्मधारी उपासकों द्वारा (इरज्यन्) शोभा प्राप्त आप, (अस्मे) हम उपासकों में (रायः) आध्यात्मिक-विभूतियों का (प्रथयस्व) विस्तार कीजिये ! हे जगन्नेता ! (सः) वह आप, (दर्शतस्य) दृष्टिगोचर (वपुषः) हम उपासकों के शरीरों के भी (वि राजसि) राजा बन चुके हैं, या दर्शनीय विराट्-जगत् रूपी अपने शरीर के आप राजा हैं, और (दर्शतम्) दर्शनीय (ऋतुम्) उपासना-यज्ञों के (पृणक्षि) पालक तथा पूर्ण करने वाले हैं ।
Footnote
[ वपुषः = वेदों में जगत् को परमेश्वर के देहरूप में वर्णित किया है । (देखो यजु० ३१। १२, १३) । यह देहवर्णन कल्पनारूप ही है “व्यकल्पयन्” (यजु० ३१। १३) । कल्पना यह दर्शाने के लिये की गई है कि यह सिद्धान्त आसानी से बुद्धिगत किया जा सके कि जैसे प्रत्येक देह में जीव आत्मा और उसकी इच्छा, ज्ञान, और प्रयत्न द्वारा कार्य हो रहे हैं, वैसे ही जगत् में भी महान् आत्मा, उसकी इच्छा, ज्ञान और प्रयत्न कार्य कर रहे हैं। ]