SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 18

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रयोगो भार्गवः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
औ꣣र्वभृगुव꣡च्छुचि꣢꣯मप्नवान꣣व꣡दा हु꣢꣯वे । अ꣣ग्नि꣡ꣳ स꣢मु꣣द्र꣡वा꣢ससम् ॥१८॥

औ꣣र्वभृगुव꣢त् । औ꣣र्व । भृगुव꣢त् । शु꣡चि꣢꣯म् । अ꣣प्नवानव꣢त् । आ । हु꣣वे । अग्नि꣢म् स꣣मुद्र꣡वा꣢ससम् । स꣣मुद्र꣢ । वा꣣ससम् ॥१८॥

Mantra without Swara
और्वभृगुवच्छुचिमप्नवानवदा हुवे । अग्निꣳ समुद्रवाससम् ॥

और्वभृगुवत् । और्व । भृगुवत् । शुचिम् । अप्नवानवत् । आ । हुवे । अग्निम् समुद्रवाससम् । समुद्र । वाससम् ॥१८॥

Samveda - Mantra Number : 18
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(समुद्रवाससम्) पार्थिव - समुद्र, आकाशीय समुद्र तथा हृदय-समुद्र में बसने वाले, (अग्निम्) प्रकाशस्वरूप जगन्नेता का (आहुवे) मैं उपासक श्रद्धा-भक्ति पूर्वक हृदय में आह्वान करता हूँ, (और्वभृगुवत्) जो कि उर्वी अर्थात् पृथिवी के पदार्थों को पकाने वाली आदित्याग्नि के समान (शुचिम्) शुद्ध और तेजस्वी है। (अप्नवानवत्) मैं इस प्रकार प्रभु का आह्वान करता हूँ जैसे कि भक्ति सम्पन्न कर्मयोगी उसका आह्वान करता है ।
Footnote
[अप्नवान = अप्न = कर्म (निघं० १। २) + वान, वन संभक्तौ ]