SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1799

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
न꣢ ते꣣ गि꣢रो꣣ अ꣡पि꣢ मृष्ये तु꣣र꣢स्य꣣ न꣡ सु꣢ष्टु꣣ति꣡म꣢सु꣣꣬र्य꣢꣯स्य वि꣣द्वा꣢न् । स꣡दा꣢ ते꣣ ना꣡म꣢ स्वयशो विवक्मि ॥१७९९॥

न । ते꣣ । गि꣡रः꣢꣯ । अ꣡पि꣢꣯ । मृ꣣ष्ये । तुर꣡स्य꣢ । न । सु꣣ष्टुति꣢म् । सु꣣ । स्तुति꣢म् । अ꣣सुर्य꣢स्य । अ꣣ । सुर्यस्य । वि꣣द्वा꣢न् । स꣡दा꣢꣯ । ते꣣ । ना꣡म꣢꣯ । स्वय꣣शः । स्व । यशः । विवक्मि ॥१७९९॥

Mantra without Swara
न ते गिरो अपि मृष्ये तुरस्य न सुष्टुतिमसुर्यस्य विद्वान् । सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि ॥

न । ते । गिरः । अपि । मृष्ये । तुरस्य । न । सुष्टुतिम् । सु । स्तुतिम् । असुर्यस्य । अ । सुर्यस्य । विद्वान् । सदा । ते । नाम । स्वयशः । स्व । यशः । विवक्मि ॥१७९९॥

Samveda - Mantra Number : 1799
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 3;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (तुरस्य) प्रविद्या के विनाशक (ते) आपकी, (गिरः अपि) वेदवाणियों को भी, (न मृष्ये) विचारने में मैं असमर्थ हूँ, और (असुर्यस्य) प्रज्ञा-तथा-प्राणशक्ति के प्रदान करने वालों में सर्वश्रेष्ठ आापकी, (सुष्टुतिम्) उत्तम-स्तुति के ढंग को भी, मैं (न दिद्वान्) नहीं जानता। मैं तो (सदा) सदा (ते) आपके (स्वयशः) निज-यशस्वी (नाम) ओ३म् नाम का, (विवक्मि) विशेषतया जप करता रहता हूँ ।
Footnote
[ योगदर्शन में प्रणव (ओ३म्) के जप द्वारा भी समाधि-सिद्धि का वर्णन किया गया है । समाधि के अन्य साधनों की अपेक्षा जप-साधन सुगम भी है । जप में ईश्वर की ओर चित्त लगाकर, “ओ३म्” का सतत मानसिक उच्चारण करना होता है, और ओ३म् के वाच्य की अर्थात् परमेश्वर की मनोभावना करनी होती है । इससे प्रत्यक्-चेतना अर्थात् जीवात्मा के निजस्वरूप का भी अधिगम हो जाता है, और परमेश्वर का भी साक्षात् हो जाता है, तथा योगमार्ग में जो बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं, उनका भी अभाव ईश्वरीय कृपा द्वारा हो जाता है । योगदर्शन के सूत्र निम्नलिखित हैं, —ईश्वर प्रणिधानाद्वा (१। २३); तस्य वाचकः प्रणवः (१। २७); तज्जपः तदर्थभावनम् (१। २८), ततः प्रत्यक् चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्व (१। २९) ]