SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 179

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रो꣢ दधी꣣चो꣢ अ꣣स्थ꣡भि꣢र्वृ꣣त्रा꣡ण्यप्र꣢꣯तिष्कुतः । ज꣣घा꣡न꣢ नव꣣ती꣡र्नव꣢꣯ ॥१७९॥

इ꣡न्द्रः꣢꣯ । द꣣धीचः꣢ । अ꣣स्थ꣡भिः꣢ । वृ꣣त्रा꣡णि꣢ । अ꣡प्र꣢꣯तिष्कुतः । अ । प्र꣣तिष्कुतः । जघा꣡न꣢ । न꣣वतीः꣢ । न꣡व꣢꣯ ॥१७९॥

Mantra without Swara
इन्द्रो दधीचो अस्थभिर्वृत्राण्यप्रतिष्कुतः । जघान नवतीर्नव ॥

इन्द्रः । दधीचः । अस्थभिः । वृत्राणि । अप्रतिष्कुतः । अ । प्रतिष्कुतः । जघान । नवतीः । नव ॥१७९॥

Samveda - Mantra Number : 179
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 7;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इन्द्रः) परमेश्वर जो कि (अप्रतिष्कुतः) किसी शक्ति से भी प्रतिरुद्ध नहीं हो सकता, (अस्थभिः) परास्त कर देने वाली अपनी शक्तियों द्वारा (दधीचः) ध्यानी की (नवतीः) न-वाली (नव)(वृत्राणि) पापमयी-वृत्तियों का (जघान) हनन कर देता है ।
Footnote
[नव = ९ वृत्तियां अर्थात् ५ ज्ञानेन्द्रिय वृत्तियां तथा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार—ये चार वृत्तियां मिलकर ९ होती हैं । ये ९ वृत्तियाँ रजस् और तमस् के बाहुल्य के कारण वृत्ररूप होती हैं । ये आत्मा पर आवरण डाले रखती हैं । (वृत्र = वृ आवरणे) । वृत्र-रूप में ये ९ वृत्तियां “नवतीः” कहलाती हैं। “नवती” का अर्थ है न-वाली, नकार वाली, अर्थात् नास्तिक रूप वाली । न—वाली वृत्तियाँ परमेश्वर को नहीं मानतीं । अतः ये नास्तिक वृत्तियां हैं । परमेश्वरीय परास्त- शक्ति द्वारा जब रजस् और तमस् दूर हो जाते हैं, तब उपर्युक्त वृत्तियां, सात्त्विक रूप धारण कर लेती हैं, तब ये वृत्तियाँ आस्तिक-वृत्तियां बन जाती हैं । इस प्रकार परमेश्वर “न-वतीः नव” वृत्तियों का हनन कर देता है । “अस्थभिः” का प्रसिद्ध अर्थ हड्डियां होता है । आस्तिक महात्माओं के जीवितावस्था में उनके सदुपदेश लोगों को आस्तिक बनाते ही रहते हैं । परन्तु इन महात्माओं के दिवंगत - हो जाने पर भी इनकी हड्डियां, राख और स्मृतियां भी लोगों को आस्तिक बनाए रखती हैं ।
[अस्थभिः = अस्त + तृतीया विभक्ति ]