SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1785

1871 Mantra
Devata- सोमः Rishi- बिन्दुः पूतदक्षो वा आङ्गिरसः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣢स्ति꣣ सो꣡मो꣢ अ꣣य꣢ꣳ सु꣣तः꣡ पिब꣢꣯न्त्यस्य म꣣रु꣡तः꣢ । उ꣣त꣢ स्व꣣रा꣡जो꣢ अ꣣श्वि꣡ना꣢ ॥१७८५॥

अ꣡स्ति꣢꣯ । सो꣡मः꣢꣯ । अ꣣य꣢म् । सु꣣तः꣢ । पि꣡ब꣢꣯न्ति । अ꣣स्य । मरु꣡तः꣢꣯ । उ꣣त꣢ । स्व꣣रा꣡जः꣢ । स्व꣣ । रा꣡जः꣢꣯ । अ꣣श्वि꣡ना꣢ ॥१७८५॥

Mantra without Swara
अस्ति सोमो अयꣳ सुतः पिबन्त्यस्य मरुतः । उत स्वराजो अश्विना ॥

अस्ति । सोमः । अयम् । सुतः । पिबन्ति । अस्य । मरुतः । उत । स्वराजः । स्व । राजः । अश्विना ॥१७८५॥

Samveda - Mantra Number : 1785
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
हे परमेश्वर ! (अयम्) यह (सोमः) भक्तिरस (सुतः अस्ति) सम्पन्न हो चुका है । आप की कृपा से मेरे (मरुतः) समग्र प्राण (अस्य) इस भक्तिरस का (पिबन्ति) पान करने लग गए हैं, और वे समग्र प्राण (स्वराजः) अपने-अपने क्षेत्र में राज्य करते हुए अनुभूत हो रहे हैं । (उत) और (अश्विना) प्राण तथा अपानरूपी मुख्य प्राण भी इस भक्तिरस का पान करने लग गये हैं । अर्थात् मेरी समग्र शारीरिक शक्तियाँ भक्तिरस द्वारा आप्लुत हो गई हैं ।
Footnote
[ अश्विनौ का नाम “नासत्यौ” भी है । नासत्यौ का अर्थ “नास्” अर्थात् नासिका में, “अत्यौ” सतत गति करने वाले, अत् सातत्यगमने । प्राण-और-अपान का नासिका में सतत-गमन होता रहता है । “प्रत्य” का अर्थ है “अश्व” । अत्यः अश्वनाम (निघं० १। १४) । अश्विनौ का “अश्व” शब्द, और नासत्यौ का “अत्य” शब्द समानार्थक हैं । अतः नासत्यौ का अर्थ हुआ “नास् में सतत गति करने वाले दो अश्व” । संस्कृत साहित्य में नासिका को “नस्” आदेश होता है (अष्टा० ६। १। ६३) “नस्” ही “नास्” में परिवर्तित हुआ है ]