SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1784

1871 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- बृहदुक्थो वामदेव्यः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
ऐ꣡भि꣢र्ददे꣣ वृ꣢ष्ण्या꣣ पौ꣡ꣳस्या꣢नि꣣ ये꣢भि꣣रौ꣡क्ष꣢द्वृत्र꣣ह꣡त्या꣢य व꣣ज्री꣢ । ये꣡ कर्म꣢꣯णः क्रि꣣य꣡मा꣢णस्य म꣣ह्न꣡ ऋ꣢ते क꣣र्म꣢मु꣣द꣡जा꣢यन्त दे꣣वाः꣢ ॥१७८४॥

आ । ए꣣भिः । ददे । वृ꣡ष्ण्या꣢꣯ । पौ꣡ꣳस्या꣢꣯नि । ये꣡भिः꣢꣯ । औ꣡क्ष꣢꣯त् । वृ꣣त्रह꣡त्या꣢य । वृ꣣त्र । ह꣡त्या꣢꣯य । व꣣ज्री꣢ । ये । क꣡र्म꣢꣯णः । क्रि꣣य꣡मा꣢णस्य । म꣣ह्ना꣢ । ऋ꣣तेकर्म꣢म् । ऋ꣣ते । कर्म꣢म् । उ꣣द꣡जा꣢यन्त । उ꣣त् । अ꣡जा꣢꣯यन्त । दे꣣वाः꣢ ॥१७८४॥

Mantra without Swara
ऐभिर्ददे वृष्ण्या पौꣳस्यानि येभिरौक्षद्वृत्रहत्याय वज्री । ये कर्मणः क्रियमाणस्य मह्न ऋते कर्ममुदजायन्त देवाः ॥

आ । एभिः । ददे । वृष्ण्या । पौꣳस्यानि । येभिः । औक्षत् । वृत्रहत्याय । वृत्र । हत्याय । वज्री । ये । कर्मणः । क्रियमाणस्य । मह्ना । ऋतेकर्मम् । ऋते । कर्मम् । उदजायन्त । उत् । अजायन्त । देवाः ॥१७८४॥

Samveda - Mantra Number : 1784
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
परमेश्वर (एभिः) इन देव कोटि के उपासक शिरोमणियों द्वारा, (वृष्ण्या) सुखवर्षक (पौंस्यानि) पौरुष कर्म (आ ददे) कराता है, (येभिः) जिन उपासक शिरोमणियों द्वारा कि (वज्री) न्यायवज्रधारी परमेश्वर, (वृत्रहत्याय) पापवृत्रों की हत्या के लिये, प्रजाजनों में (औक्षत्) शक्ति सींचता रहता है, तथा (ये देवाः) जो देवकोटि के उपासक शिरोमणि (क्रियमाणस्य) किये जाने वाले (मह्नः कर्मणः) महत्त्वशाली कर्म की सफलता के लिये, परमेश्वर के प्रति सदा (उदजायन्त) उन्मुख रहते हैं, क्योंकि ऐसे महत्वशाली (कर्मम्) कर्म (ऋते) परमेश्वर की सहायता के बिना सफल नहीं हो पाते ।
अथवा
(ये) जो (देवाः) देवकोटि के उपासक शिरोमणि, — (क्रियमाणस्य) सांसारिक दृष्टि से किये जा रहे (मह्नः कर्मणः) महत्वशाली कर्मों के होते हुए भी,(ऋते कर्मम्) केवल सत्यमय कर्मों को करते हुए (उदजायन्त) उन्नति प्राप्त करते हैं, और (येभिः) जिन देवकोटि के उपासक शिरोमणियों द्वारा कि (वज्री) न्यायवज्रधारी परमेश्वर, (वृत्रहत्याय) पाप-वृत्रों की हत्या के लिये, प्रजाजनों में (औक्षत्) शक्ति खींचता रहता है, (एभिः) ऐसे देवकोटि के उपासकों द्वारा परमेश्वर, (वृष्ण्पा) सुखपूर्वक (पौंस्यानि) पौरुषकर्म (आ ददे) कराता रहता है ।
Footnote
[ “ऋते कर्मम्” को समस्त पद मान कर यह द्वितीय अर्थ किया गया है ]