SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1775

1871 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ꣣भि꣢ द्वि꣣ज꣢न्मा꣣ त्री꣡ रो꣢च꣣ना꣢नि꣣ वि꣢श्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि शुशुचा꣣नो꣡ अ꣢स्थात् । हो꣢ता꣣ य꣡जि꣢ष्ठो अ꣣पा꣢ꣳ स꣣ध꣡स्थे꣢ ॥१७७५॥

अभि꣢ । द्वि꣣ज꣡न्मा꣢ । द्वि꣣ । ज꣡न्मा꣢꣯ । त्रि । रो꣣चना꣡नि꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । र꣡जा꣢꣯ꣳसि । शु꣣शुचानः꣢ । अ꣣स्थात् । हो꣡ता꣢꣯ । य꣡जि꣢꣯ष्ठः । अ꣣पा꣢म् । स꣣ध꣡स्थे꣢ । स꣣ध꣢ । स्थे꣣ ॥१७७५॥

Mantra without Swara
अभि द्विजन्मा त्री रोचनानि विश्वा रजाꣳसि शुशुचानो अस्थात् । होता यजिष्ठो अपाꣳ सधस्थे ॥

अभि । द्विजन्मा । द्वि । जन्मा । त्रि । रोचनानि । विश्वा । रजाꣳसि । शुशुचानः । अस्थात् । होता । यजिष्ठः । अपाम् । सधस्थे । सध । स्थे ॥१७७५॥

Samveda - Mantra Number : 1775
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 9; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 20; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(द्विजन्मा) दो साधनों अर्थात् अभ्यास और वैराग्य, या देहरूपी अधरारणि और प्रणवरूपी उत्तरारणि से प्रकट होता, (त्री रोचनानि) अग्नि-सूर्य-चान्द–इन तीन ज्योतियों को, तथा (विश्वा रजांसि) अन्त सब लोक लोकान्तरों को (शुशुचानः) प्रकाशित करता, (होता) सब का दाता, (यजिष्ठः) संसार-यज्ञ का रचयिता, (अपाम) प्राणों के (सधस्थे) स्थान अर्थात् हृदय में, जो स्थान कि जीवात्मा और परमात्मा इन दोनों का निवासस्थान है, (अभि) साक्षात् (अस्थात्) स्थित हुआ-हुआ है ।
Footnote
[ द्विजन्मा = “स्वदेहमरणि कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ध्याननिर्मथनाभ्यासात् देवं पश्येत् निगूढवत्” (मन्त्र संख्या ९) ]