SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1759

1871 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhand- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
य꣢द्यु꣣ञ्जा꣢थे꣣ वृ꣡ष꣢णमश्विना꣣ र꣡थं꣢ घृ꣣ते꣡न꣢ नो꣣ म꣡धु꣢ना क्ष꣣त्र꣡मु꣢क्षतम् । अ꣣स्मा꣢कं꣣ ब्र꣢ह्म꣣ पृ꣡त꣢नासु जिन्वतं व꣣यं꣢꣫ धना꣣ शू꣡र꣢साता भजेमहि ॥१७५९॥

यत् । यु꣣ञ्जा꣢थे꣢इ꣡ति꣢ । वृ꣡ष꣢꣯णम् । अ꣣श्विना । र꣡थ꣢꣯म् । घृ꣣ते꣡न꣢ । नः꣣ । म꣡धु꣢꣯ना । क्ष꣣त्र꣢म् । उ꣣क्षतम् । अस्मा꣡क꣢म् । ब्र꣡ह्म꣢꣯ । पृ꣡त꣢꣯नासु । जि꣣न्वतम् । वय꣢म् । ध꣡ना꣢꣯ । शू꣡र꣢꣯साता । शू꣡र꣢꣯ । सा꣣ता । भजेमहि ॥१७५९॥

Mantra without Swara
यद्युञ्जाथे वृषणमश्विना रथं घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम् । अस्माकं ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि ॥

यत् । युञ्जाथेइति । वृषणम् । अश्विना । रथम् । घृतेन । नः । मधुना । क्षत्रम् । उक्षतम् । अस्माकम् । ब्रह्म । पृतनासु । जिन्वतम् । वयम् । धना । शूरसाता । शूर । साता । भजेमहि ॥१७५९॥

Samveda - Mantra Number : 1759
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 5;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अश्विना) हे अश्वियो ! तुम दोनों (यत्) जब (वृषणं रथम्) वर्षा करने वाले सूर्य-रथ को (युञ्जाथे) अपने जाने के निमित्त जोतते हो, तब तुम (घृतेन मधुना) घृत और मधु आदि भोग्य पदार्थों के साथ-साथ हम में (क्षत्रम्) आसुरी-प्रवृत्तियों के साथ युद्ध करने के लिये क्षात्रभावनाओं को भी (उक्षतम्) सींचो । (पृतनासु) काम-क्रोधादि की सेनाओं में, सहायक रूप में, (अस्माकम्) हमारे उपास्य (ब्रह्म) ब्रह्म को (जिन्वतम्) प्रसन्न करो, ताकि (शूरसाता) इन संग्रामों में (वयम्) हम (धना) आध्यात्मिक-धनों के (भजेमहि) भागी बनें।
Footnote
[ सूर्योदय से पूर्व मुमुक्षु ध्यान में मग्न था । सूर्योदय होने पर वह व्युत्थित दशा में आया । तब खानपान का व्यवहार चला, और सांसारिक भावनाओं के होते, काम-क्रोध आदि के साथ युद्ध की सम्भावना में क्षात्रभावना की भी आवश्यकता अनुभूत हुई, और साथ ही ब्राह्मी सहायता की भी आवश्यकता हुई, – यह भाव इस मन्त्र में प्रकट किया गया है ]