SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1754

1871 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
उ꣣ता꣡ या꣢तꣳ संग꣣वे꣢ प्रा꣣त꣡रह्नो꣢꣯ म꣣ध्य꣡न्दि꣢न꣣ उ꣡दि꣢ता꣣ सू꣡र्य꣢स्य । दि꣢वा꣣ न꣢क्त꣣म꣡व꣢सा꣣ श꣡न्त꣢मेन꣣ ने꣡दानीं꣢꣯ पी꣣ति꣢र꣣श्वि꣡ना त꣢꣯तान ॥१७५४॥

उत꣢ । आ । या꣣तम् । संगवे꣢ । स꣣म् । गवे꣢ । प्रा꣣तः꣢ । अ꣡ह्नः꣢꣯ । अ । ह्नः꣣ । मध्य꣡न्दि꣢ने । उ꣡दि꣢꣯ता । उत् । इ꣣ता । सू꣡र्य꣢꣯स्य । दि꣡वा꣢꣯ । न꣡क्त꣢꣯म् । अ꣡व꣢꣯सा । श꣡न्त꣢꣯मेन । न । इ꣣दा꣡नी꣢म् । पी꣣तिः꣢ । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । आ । त꣣तान ॥१७५४॥

Mantra without Swara
उता यातꣳ संगवे प्रातरह्नो मध्यन्दिन उदिता सूर्यस्य । दिवा नक्तमवसा शन्तमेन नेदानीं पीतिरश्विना ततान ॥

उत । आ । यातम् । संगवे । सम् । गवे । प्रातः । अह्नः । अ । ह्नः । मध्यन्दिने । उदिता । उत् । इता । सूर्यस्य । दिवा । नक्तम् । अवसा । शन्तमेन । न । इदानीम् । पीतिः । अश्विना । आ । ततान ॥१७५४॥

Samveda - Mantra Number : 1754
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(उत) तथा (अश्विना) हे अश्विनौ ! (आ यातम्) तुम आओ (संगवे) जब कि मध्य रात्री के उपरान्त अन्धकार में सूर्य रश्मियों का प्रथम संगम हो, (प्रातः) तथा प्रातःकाल, (अह्नः मध्यन्दिने) मध्याह्न में, (सूर्यस्य उदिता) सूर्य के उदय होने पर, (दिवा) दिन भर, (नक्तम्) रात्री में, (न इदानीम्) केवल इसी समय अर्थात् मध्यरात्री के पश्चात् ही नहीं, अपितु प्रतिदिन सब कालों में तुम आया करो, (शन्तमेन) अत्यधिक शान्तिदायक (अवसा) ब्रह्मानन्दरसरूपी - अन्न के साथ आया करो, ताकि (पीतिः) हमारा ब्रह्मानन्दरस का पान (ततान) सदा जारी रहो ।
Footnote
[ मुमुक्षु चाहता है कि योगसाधना का आश्वि-काल उसके लिये सदा बना रहे, सदा, अर्थात् प्रतिदिन, हर समय, उसकी योगसाधना प्रस्तुत रहे, ताकि वह ब्रह्मानन्दरस का पान बिना विच्छेद कर सके । प्राकृतिक—अश्विकाल का प्रतिरूप आध्यात्मिक-अश्विकाल है, उसे वह योगी सदा बनाए रखना चाहता है । आध्यात्मिक-अश्विकाल की व्याख्या मन्त्र १७५३ में की गई है।
“छन्द” की दृष्टि से मन्त्र में “अह्नः मध्यन्दिने” का पाठ “उदिता सूर्यस्य” से पूर्व हुआ है। अभिप्राय-दृष्टि से यह पाठ “उदिता सूर्यस्य” के पश्चात् समझना चाहिये । [ अवसा = अवस् = अन्न (निघं० २। ७) । प्रातः = प्रकृष्टमतति गच्छतीति प्रातः = प्रभातकालः (उणाः कोष ५। ५९), अजमेर ]