SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1753

1871 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- अत्रिर्भौमः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
न꣡ स꣢ꣳस्कृ꣣तं꣡ प्र मि꣢꣯मीतो꣣ ग꣢मि꣣ष्ठा꣡न्ति꣢ नू꣣न꣢म꣣श्वि꣡नोप꣢꣯स्तुते꣣ह꣢ । दि꣡वा꣢भिपि꣣त्वे꣢ऽव꣣सा꣡ग꣢मिष्ठा꣣ प्र꣡त्यव꣢꣯र्त्तिं दा꣣शु꣢षे꣣ श꣡म्भ꣢विष्ठा ॥१७५३॥

न । स꣣ꣳस्कृत꣢म् । स꣣म् । कृत꣢म् । प्र । मि꣣मीतः । ग꣡मि꣢꣯ष्ठा । अ꣡न्ति꣢꣯ । नू꣣न꣢म् । अ꣣श्वि꣡ना꣢ । उ꣡प꣢꣯स्तुता । उ꣡प꣢꣯ । स्तु꣣ता । इह । दि꣡वा꣢꣯ । अ꣡भिपित्वे꣢ । अ꣢भि । पित्वे꣢ । अ꣡व꣢꣯सा । आ꣡ग꣢꣯मिष्ठा । आ । ग꣣मिष्ठा । प्र꣡ति꣢꣯ । अ꣡व꣢꣯र्तिम् । दा꣣शु꣡षे꣢ । श꣡म्भ꣢꣯विष्ठा । शम् । भ꣣विष्ठा ॥१७५३॥

Mantra without Swara
न सꣳस्कृतं प्र मिमीतो गमिष्ठान्ति नूनमश्विनोपस्तुतेह । दिवाभिपित्वेऽवसागमिष्ठा प्रत्यवर्त्तिं दाशुषे शम्भविष्ठा ॥

न । सꣳस्कृतम् । सम् । कृतम् । प्र । मिमीतः । गमिष्ठा । अन्ति । नूनम् । अश्विना । उपस्तुता । उप । स्तुता । इह । दिवा । अभिपित्वे । अभि । पित्वे । अवसा । आगमिष्ठा । आ । गमिष्ठा । प्रति । अवर्तिम् । दाशुषे । शम्भविष्ठा । शम् । भविष्ठा ॥१७५३॥

Samveda - Mantra Number : 1753
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(अश्विना) हे अश्वियो ! तुम मेरे (संस्कृतम्) सम्यक्-विधि से उपार्जित विवेकज-ज्ञान को (प्र मिमीतः न) विनष्ट नहीं होने देते । (गमिष्ठा) सूर्य के चढ़ने पर चले जाने वाले अश्वियो ! (उप स्तुता) जब मैं उपासना-विधि से भक्तिपूर्वक स्तुतियां करूँ, तब (इह) मेरे इस उपासना-यज्ञ में (नूनम्) अवश्य (अन्ति) मेरे समीप आना, अर्थात् (दिवाभिपित्वे) अगले दिन के प्राप्त होने पर, (अवसा) मेरी रक्षा की दृष्टि से, (आा गमिष्ठा) तुमने आना, (प्रत्यवर्तिम्) प्रत्यार्वतन करना, लौट कर फिर आना । और (दाशुषे) जिसने परमेश्वर-देव के प्रति आत्मसमर्पण कर दिया है उसे (शम् भविष्ठा) शान्ति प्रदान करना ।
Footnote
[ अश्विनौ का काल, मध्यरात्री के पश्चात् रात्री के तमस् में, सूर्य की अलक्षित रश्मियों के प्रवेश से लेकर, सूर्योदय पर्यन्त माना गया है (निरुक्त) । सूर्योदय होने पर अश्विकाल समाप्त हो जाता है, तब मानो अश्विनौ सूर्य-रथ पर सवार हो कर चले जाते हैं । अश्विनी का काल प्रशान्त होता है, अतः योगाभ्यास के लिये अत्युपयोगी है । यह प्राकृतिक-काल, आध्यात्मिक-काल का भी सूचक है। आध्यात्मिक अश्विनौ-काल वह काल है जब अविद्यारात्री के गहरे अन्धकार में ज्ञानज्योति का प्राथमिक-मिश्रण होकर, इस अविद्यान्धकार में ज्ञान-ज्योति अधिकाधिक बढ़ती जाती है, और अभ्यास करते-करते विवेकज-ज्ञान की उषा अपने स्वच्छ और भव्य प्रकाश में चमकने लगती है । यह परिस्थिति मोक्ष की अन्तिम सीढ़ी है। उपासक में अश्विनौ-काल के प्रत्यागमन की उग्र-अभिलाषा है । उपासक नहीं चाहता कि विवेकज- ज्ञान से पूर्व उसका शरीरपात हो। इसलिये जब तक उपासक में विवेकज-ज्ञान की उषा चमक नहीं उठती, तब तक, अश्विनौ-काल के प्रत्यागमन की अभिलाषा, उपासक करता रहता है । मुमुक्षु के लिये, इस अभिलाषा का अन्तिम समय तक जारी रहना, स्वाभाविक है ।
[ प्रत्यवर्तिम् = प्रत्यावर्तिम् लक्ष्यीकृत्य । अवर्त्तिः = अनावर्तनम्, तत्प्रतिकूलम् = आवर्तनम् ]