SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1750

1871 Mantra
Devata- उषाः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
रु꣡श꣢द्वत्सा꣣ रु꣡श꣢ती श्वे꣣त्या꣢गा꣣दा꣡रै꣢गु कृ꣣ष्णा꣡ सद꣢꣯नान्यस्याः । स꣣मान꣡ब꣢न्धू अ꣣मृ꣡ते꣢ अनू꣣ची꣢꣫ द्यावा꣣ व꣡र्णं꣢ चरत आमिना꣣ने꣢ ॥१७५०॥

रु꣡श꣢꣯द्वत्सा । रु꣡श꣢꣯त् । व꣣त्सा । रु꣡श꣢꣯ती । श्वे꣣त्या꣢ । आ । अ꣣गात् । आ꣡रै꣢꣯क् । उ꣣ । कृष्णा꣢ । स꣡द꣢꣯नानि । अ꣣स्याः । समान꣡ब꣢꣯न्धू । समान꣢ । ब꣣न्धूइ꣡ति꣢ । अ꣣मृ꣡ते꣢ । अ꣣ । मृ꣢ते꣢꣯इ꣡ति꣢ । अ꣣नूची꣡इति꣢ । द्या꣡वा꣢꣯ । व꣡र्ण꣢꣯म् । च꣣रतः । आमिनाने꣢ । आ꣣ । मिनाने꣡इति꣢ ॥१७५०॥

Mantra without Swara
रुशद्वत्सा रुशती श्वेत्यागादारैगु कृष्णा सदनान्यस्याः । समानबन्धू अमृते अनूची द्यावा वर्णं चरत आमिनाने ॥

रुशद्वत्सा । रुशत् । वत्सा । रुशती । श्वेत्या । आ । अगात् । आरैक् । उ । कृष्णा । सदनानि । अस्याः । समानबन्धू । समान । बन्धूइति । अमृते । अ । मृतेइति । अनूचीइति । द्यावा । वर्णम् । चरतः । आमिनाने । आ । मिनानेइति ॥१७५०॥

Samveda - Mantra Number : 1750
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
विवेकज ज्ञानरूपी ज्योतिर्मयी चित्तवृत्ति ने (रुशद्वत्सा) जीवात्म-रूपी पुत्र को चमका दिया है, उसे उसके आत्मस्वरूप का प्रदर्शन करा दिया है । (रुशती) यह चित्तवृत्ति प्रकाशमयी है, (श्वेत्या) श्वेतवर्ण वाले सत्वगुण का परिणामरूप है, (आ गात्) मुझ में प्रकट हुई हैं । (कृष्णा) काली तमोमयी चित्तवृत्ति ने (अस्याः) इस सत्त्वमयी चित्तवृत्ति के (सदनानि) स्थानों को (आरैक् उ) रिक्त कर दिया है, खाली कर दिया है । (समानबन्धू) कृष्ण चित्तवृत्ति और श्वेतचित्तवृत्ति एक ही चित्त के बन्धन में बन्धी हुई हैं। (अमृते) ये दोनों प्रकार की चित्तवृत्तियां अनादि काल से चली आ रही हैं । (अनूची) ये एक-दूसरे के साथ लगी हुई हैं । (द्यावा) दोनों ही अपने-अपने रूपों में चमकती हुई (चरतः) विचार रही हैं, और (वर्णम्) एक-दूसरे के स्वरूप को (आ मिनाने) विनष्ट करती हैं ।
Footnote
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