SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1749

1871 Mantra
Devata- उषाः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhand- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ꣣द꣢꣫ꣳ श्रेष्ठं꣣ ज्यो꣡ति꣢षां꣣ ज्यो꣢ति꣣रा꣡गा꣢च्चि꣣त्रः꣡ प्र꣢के꣣तो꣡ अ꣢जनिष्ट꣣ विभ्वा꣢ । य꣢था꣣ प्र꣡सू꣢ता सवि꣣तुः꣢ स꣣वा꣢यै꣣वा꣢꣫ रात्र्यु꣣ष꣢से꣣ यो꣡नि꣢मारैक् ॥१७४९॥

इ꣣द꣢म् । श्रे꣡ष्ठ꣢꣯म् । ज्यो꣡ति꣢꣯षाम् । ज्यो꣡तिः꣢꣯ । आ । अ꣣गात् । चित्रः꣢ । प्र꣣केतः꣢ । प्र꣣ । केतः꣢ । अ꣣जनिष्ट । वि꣡भ्वा꣢꣯ । वि । भ्वा꣣ । य꣡था꣢꣯ । प्र꣡सू꣢꣯ता । प्र । सू꣢ता । सवितुः꣢ । स꣣वा꣡य꣢ । ए꣣व꣢ । रा꣡त्री꣢꣯ । उ꣣ष꣡से꣢ । यो꣡नि꣢꣯म् । आ꣣रैक् ॥१७४९॥

Mantra without Swara
इदꣳ श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरागाच्चित्रः प्रकेतो अजनिष्ट विभ्वा । यथा प्रसूता सवितुः सवायैवा रात्र्युषसे योनिमारैक् ॥

इदम् । श्रेष्ठम् । ज्योतिषाम् । ज्योतिः । आ । अगात् । चित्रः । प्रकेतः । प्र । केतः । अजनिष्ट । विभ्वा । वि । भ्वा । यथा । प्रसूता । प्र । सूता । सवितुः । सवाय । एव । रात्री । उषसे । योनिम् । आरैक् ॥१७४९॥

Samveda - Mantra Number : 1749
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 4;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(इदं ज्योतिः) यह विवेकज ज्ञान रूपी ज्योति (ज्योतिषाम्) अन्य ज्योतियों से अर्थात् ज्ञानेन्द्रियों, मन आदि की ज्योतियों से (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठ हैं । (आ गात्) यह ज्योति मुझे प्राप्त हुई है । (चित्रः) यह अद्भुत ज्योति (प्रकेतः) जो कि प्रज्ञान रूप है, (विभु) और सर्वविषयों का ज्ञान कराती है, — (आ अजनिष्ट) मुझ में आ प्रकट हुई है। (यथा) जैसे यह ज्योति (प्रसूता) प्रकट हुई है (सवितुः) सर्वप्रेरक-तथा-सर्वोत्पादक परमेश्वर के (सवाय) स्वरूपज्ञान के लिये, और स्वरूपज्ञान दे कर (आरैक्) यह अपना स्थान रिक्त कर देती है, अर्थात् समाप्त हो जाती है, (एवा) ऐसे ही (रात्री) अविद्या-की-रात्री ने (उषसे) विवेकज ज्ञान-रूपी उषा को प्रकट कर, (योनिम्) अपने स्थान को (आरैक्) रिक्त कर दिया है, अर्थात् समाप्त हो गई है ।
Footnote
[ विवेकज-ज्ञान से सर्वभावाधिष्ठातृत्व तथा सर्वज्ञत्व की शक्तियां प्रकट हो जाती हैं। (योग० ३। ४९), तथा यह ज्ञान सर्वविषयक, सर्वथा विषयक, तथा युगपत् होता है (योग० ३। ५४) । विवेकज-ज्ञान, परमेश्वर का स्वरूप दर्शा कर, और असम्प्रज्ञात समाधि प्रकट कर मोक्ष हो जाने पर विनष्ट हो जाता है ]