SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1734

1871 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
अ꣡श्वि꣢ना व꣣र्ति꣢र꣣स्म꣡दा गोम꣢꣯द्दस्रा꣣ हि꣡र꣢ण्यवत् । अ꣣र्वा꣢꣫ग्रथ꣣ꣳ स꣡म꣢नसा꣣ नि꣡ य꣢च्छतम् ॥१७३४॥

अ꣡श्वि꣢꣯ना । व꣣र्तिः꣢ । अ꣣स्म꣢त् । आ । गो꣡म꣢꣯त् । द꣣स्रा । हि꣡र꣢꣯ण्यवत् । अ꣣र्वा꣢क् । र꣡थ꣢꣯म् । स꣡म꣢꣯नसा । स । म꣣नसा । नि꣢ । य꣣च्छतम् ॥१७३४॥

Mantra without Swara
अश्विना वर्तिरस्मदा गोमद्दस्रा हिरण्यवत् । अर्वाग्रथꣳ समनसा नि यच्छतम् ॥

अश्विना । वर्तिः । अस्मत् । आ । गोमत् । दस्रा । हिरण्यवत् । अर्वाक् । रथम् । समनसा । स । मनसा । नि । यच्छतम् ॥१७३४॥

Samveda - Mantra Number : 1734
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(दस्त्रा) अविद्यान्धकार का क्षय करने वाले (अश्विना) हे अश्वियो ! तुम दोनों, (समनसा) मानो एक मन होकर, (अर्वाक्) हमारी ओर आने वाले (रथम्) अपने प्रस्थानोपयोगी सूर्य रथ को (अस्मत्) हम से (आ नि यच्छतम्) अभी दूर ही नियन्त्रित कर दो, अभी उसे उदित न होने दो। सूर्य रथ जो कि (वर्तिः) सांसारिक वर्तन-वर्ताव तथा व्यवहारों का साधन है, (गोमत्) जो कि रश्मियों से युक्त, तथा (हिरण्यवत्) सुवर्णसदृश चमकीला है ।
Footnote
[ मन्त्र में वर्णन कविताशैली का है । इसी शैली के अनुसार अश्वियों का सम्बोधन किया गया है। दोनों अश्विनौ सदा साथ रहते हैं, परस्पर घुले-मिले से रहते हैं । मध्यरात्री के बाद का काल जब कि अन्धकार में प्रकाश का अनुप्रवेश होता है, तब यह मिश्रण अर्थात् अन्धकार और प्रकाश का परस्पर घुले-मिले हो कर संमिश्रणरूप होना, — यही अश्विनौ का काल है । इस संमिश्रण के कारण अश्विनौ को “समनसा = समनसो” कहा है। चूंकि ये कभी एक-दूसरे से पृथक् नहीं होते । मानो इन दोनों का मन एक ही है ।
उपासक जब यह अनुभव करते हैं कि सूर्योदय हुआ तो अश्विनौ का काल समाप्त हो जायगा, और अश्विनौ सूर्य-रथ पर सवार हो कर प्रस्थान कर जायेंगे, और हमारा ब्रह्मध्यान सम्बन्धी आनन्दरस का आस्वादन समाप्त हो जायगा, तब वे व्याकुल से होकर अश्विनी के प्रति कहते हैं कि हे “अश्विनौ” अपने सूर्य रथ को, इसकी अपनी रथ-शाला से, बाहिर न निकालो, अर्थात् सूर्य को अभी कुछ काल तक उदित होने से और रोक दो, ताकि हमें ध्यान का और मौका मिल सके । परमेश्वर को वेदों में कवि कहा है, और वेदों को काव्य कहा है । इसलिये वेदों में स्थान-स्थान पर कविताशैली में वर्णन मिलते हैं । सूर्य का उदित होना सांसारिक धन्धों में प्रवृत्त करने के लिये है, वह ध्यान के लिये उपयोगी नहीं। ]