SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1730

1871 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
व꣣च्य꣡न्ते꣢ वां ककु꣣हा꣡सो꣢ जू꣣र्णा꣢या꣣म꣡धि꣢ वि꣣ष्ट꣡पि꣢ । य꣢द्वा꣣ꣳ र꣢थो꣣ वि꣢भि꣣ष्प꣡ता꣢त् ॥१७३०॥

व꣣च्य꣡न्ते꣢ । वा꣣म् । ककुहा꣡सः꣢ । जू꣣र्णा꣡या꣢म् । अ꣡धि꣢꣯ । वि꣣ष्ट꣡पि꣢ । यत् । वा꣣म् । र꣡थः꣢꣯ । वि꣡भिः꣢꣯ । प꣡ता꣢꣯त् ॥१७३०॥

Mantra without Swara
वच्यन्ते वां ककुहासो जूर्णायामधि विष्टपि । यद्वाꣳ रथो विभिष्पतात् ॥

वच्यन्ते । वाम् । ककुहासः । जूर्णायाम् । अधि । विष्टपि । यत् । वाम् । रथः । विभिः । पतात् ॥१७३०॥

Samveda - Mantra Number : 1730
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(विष्टपि) ताप-रहित रात्री-काल के (जूर्णायाम्) जीर्ण हो जाने पर, (अधि) तदनन्तर जब हे अश्वियो ! (वाम) तुम्हारा (रथः) सूर्य, (विभिः) पक्षियों के साथ, (पतात्) आकाश में उड़ने लगता है, तब अश्वियों के सम्बन्ध में उपासकों के मुखों से (वच्यन्ते) ये वचन निकलते हैं कि (ककुहासः) । “वह उपासना काल का सुख, या ब्रह्मानन्दरस, कहां चला गया ?”
Footnote
[ मन्त्र १७२६ के अनुसार अश्वियों का काल सूर्योदय पर्यन्त है । अश्वियों का काल समाप्त हो जाता है सूर्य के उदय होने पर । कल्पना की गई है कि अश्विनौ मानो सूर्यरूपी रथ में सवार होकर प्रस्थान कर गये हैं । प्रस्थान काल की सूचना आकाश में पक्षियों के उड़ने द्वारा भी दी गई है । अश्विनौ के काल में उपासक, ब्रह्म में मग्न हो, सुख का या ब्रह्मानन्द रस का आस्वादन ले रहे थे । अश्विनौ के काल की समाप्ति पर उपासकों की उपासनाओं की भी समाप्ति हो गई। समाप्तिकाल में उपासकों के मुखों से ये वचन सहसा निकल पड़ते हैं कि “वह उपासना सुख या ब्रह्मानन्द रस, अब कहां चला गया, कब अश्विनौ का काल पुनः आयेगा कि हम इस उपासना-सुख या ब्रह्मानन्दरस की अनुभूति फिर करेंगे ? ककुहासः = क (सुख, तथा प्रजापति) + कुह (कहां) + अस् (प्रक्षेपे, प्रक्षिप्त हो गया, चला गया ]