SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1729

1871 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
या꣢ द꣣स्रा꣡ सिन्धु꣢꣯मातरा मनो꣣त꣡रा꣢ रयी꣣णा꣢म् । धि꣣या꣢ दे꣣वा꣡ व꣢सु꣣वि꣡दा꣢ ॥१७२९॥

या꣢ । द꣣स्रा꣢ । सि꣡न्धु꣢꣯मातरा । सि꣡न्धु꣢꣯ । मा꣣तरा । मनोत꣡रा꣢ । र꣣यीणा꣢म् । धि꣣या꣢ । दे꣣वा꣢ । व꣣सुवि꣡दा꣢ । वसु꣣ । वि꣡दा꣢꣯ ॥१७२९॥

Mantra without Swara
या दस्रा सिन्धुमातरा मनोतरा रयीणाम् । धिया देवा वसुविदा ॥

या । दस्रा । सिन्धुमातरा । सिन्धु । मातरा । मनोतरा । रयीणाम् । धिया । देवा । वसुविदा । वसु । विदा ॥१७२९॥

Samveda - Mantra Number : 1729
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(दस्त्रा) अविद्यादि-क्लेशों का क्षय करने वाले (सिन्धु मातरा) हृदय-सिन्धु का नव-निर्माण करने वाले, (मनोतरा) मन को संकल्प-विकल्पों के नद से तैराने वाले, मन को निरोधावस्था में लाने वाले, (रयीणाम्) आध्यात्मिक-सम्पत्तियां (देवौ) देने वाले, (धिया) सद्बुद्धि और सत्कर्मों के साथ-साथ (वसुविदा) आध्यात्मिक-सम्पत्तियां देने वाले (या) जो दो अश्विनौ हैं, उनके गुणों का मैं कथन करता हूँ ।
Footnote
[ सिन्धु = हृदय (अथर्व० १०। २। ११) । हृदय को भक्तिरस से आप्लुत करना, — हृदय का नव-निर्माण है । अश्वि-काल में ध्यानमग्न होने का फल मन्त्र में कहा गया है ]