SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1728

1871 Mantra
Devata- अश्विनौ Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
ए꣣षो꣢ उ꣣षा꣡ अपू꣢꣯र्व्या꣣꣬ व्यु꣢꣯च्छति प्रि꣣या꣢ दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣡ वा꣢मश्विना बृ꣣ह꣢त् ॥१७२८॥

ए꣣षा꣢ । उ꣣ । उषाः꣢ । अ꣡पू꣢꣯र्व्या । अ । पू꣣र्व्या । वि꣢ । उ꣣च्छति । प्रिया꣢ । दि꣣वः꣢ । स्तु꣣षे꣢ । वा꣣म् । अश्विना । बृह꣢त् ॥१७२८॥

Mantra without Swara
एषो उषा अपूर्व्या व्युच्छति प्रिया दिवः । स्तुषे वामश्विना बृहत् ॥

एषा । उ । उषाः । अपूर्व्या । अ । पूर्व्या । वि । उच्छति । प्रिया । दिवः । स्तुषे । वाम् । अश्विना । बृहत् ॥१७२८॥

Samveda - Mantra Number : 1728
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(एषा उ) यह ही (उषाः) आध्यात्मिक-उषा अर्थात् मूर्द्ध-ज्योति (अपूर्व्या) एक अपूर्व-ज्योति है, (प्रिया) यह प्रियरूप वाली है, (दिवः) मूर्द्धा या मस्तिष्क से प्रकट होकर इसने (व्युच्छति) मेरी अज्ञानी-रात्री को हरा दिया है। मैं इस सम्बन्ध में (वाम् अश्विना) तुम दो अश्वियों के गुणों का (बृहत् स्तुषे) महागान करता हूँ, इनके गुणों का प्रभूत कथन करता हूँ ।
Footnote
[ मध्य रात्री के उपरान्त, जब रात्री के अन्धकार में आदित्य के प्रकाश का अनुप्रवेश होता है, तो अश्विकाल प्रारम्भ होता है । यह समय शान्त होता है । इस काल में ध्यान करना उत्तम माना गया है । इसलिए यह काल प्रशंसित है ]