SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1726

1871 Mantra
Devata- उषाः Rishi- वामदेवो गौतमः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
अ꣡श्वे꣢व चि꣣त्रा꣡रु꣢षी मा꣣ता꣡ गवा꣢꣯मृ꣣ता꣡व꣢री । स꣡खा꣢ भूद꣣श्वि꣡नो꣢रु꣣षाः꣡ ॥१७२६॥

अ꣡श्वा꣢꣯ । इ꣣व । चित्रा꣢ । अ꣡रु꣢꣯षी । मा꣣ता꣢ । ग꣡वा꣢꣯म् । ऋ꣣ता꣡व꣢री । स꣡खा꣢꣯ । स । खा꣣ । भूत् । अश्वि꣡नोः꣢ । उ꣣षाः꣢ ॥१७२६॥

Mantra without Swara
अश्वेव चित्रारुषी माता गवामृतावरी । सखा भूदश्विनोरुषाः ॥

अश्वा । इव । चित्रा । अरुषी । माता । गवाम् । ऋतावरी । सखा । स । खा । भूत् । अश्विनोः । उषाः ॥१७२६॥

Samveda - Mantra Number : 1726
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 2;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
(उषाः) वह आध्यात्मिक-उषा अर्थात् मूर्द्ध-ज्योति (अश्व इव चित्रा) पूर्व दिशा में व्याप्त उषा के सदृश विचित्र स्वरूप वाली है, (अरुषी) चमकीली, (गवाम् माता) प्रकाशों की जननी, (ऋतावरी) तथा सत्यमार्ग दर्शाती है । तथा (अश्विनाः) अश्वियों की (सखा) सखी है ।
Footnote
[ अश्वा = अशूङ् व्याप्तौ । अश्विनो; = निरुक्त १२। १। १-५) में अश्वियों का काल मध्यरात्री के उपरान्त, रात्री के तमस् में प्रकाश के अनु प्रवेश से लेकर सूर्योदय पर्यन्त कहा है। साथ ही यह भी कहा है कि योगाभ्यास के लिये यह काल अत्यन्त उपयोगी है । ऋग्वेद में कहा है कि “पूर्वः पूर्वः यजमानो वनीयान्” (ऋ० ५। ७७। २) ; अर्थात् इस अश्विकाल में जो उपासक जितना पहिले उपासना में रत हो जाता है वह उपासना का फल शीघ्र पाता है । आधिदैविक- उषा का काल सूर्योदय से कुछ पूर्व होता है । सूर्योदय काल से पूर्व प्रकट मूर्द्ध ज्योति को, इस दृष्टि से, उषा से उपमित किया है । इसलिये यह मूर्द्धज्योति अश्वियों की सखी है । ]