SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

Samveda Mantra 1717

1871 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- अवत्सारः काश्यपः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
त꣡ꣳ हि꣢न्वन्ति मद꣣च्यु꣢त꣣ꣳ ह꣡रिं꣢ न꣣दी꣡षु꣢ वा꣣जि꣡न꣢म् । इ꣢न्दु꣣मि꣡न्द्रा꣢य मत्स꣣र꣢म् ॥१७१७॥

त꣢म् । हि꣣न्वन्ति । मदच्यु꣡त꣢म् । म꣣द । च्यु꣡त꣢꣯म् । ह꣡रि꣢꣯म् । न꣣दी꣡षु꣢ । वा꣣जि꣡न꣢म् । इ꣡न्दु꣢꣯म् । इ꣡न्द्रा꣢꣯य । म꣣त्सर꣢म् ॥१७१७॥

Mantra without Swara
तꣳ हिन्वन्ति मदच्युतꣳ हरिं नदीषु वाजिनम् । इन्दुमिन्द्राय मत्सरम् ॥

तम् । हिन्वन्ति । मदच्युतम् । मद । च्युतम् । हरिम् । नदीषु । वाजिनम् । इन्दुम् । इन्द्राय । मत्सरम् ॥१७१७॥

Samveda - Mantra Number : 1717
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 8; Ardh Prapathak » 3;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 19; Khand » 1;

SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand)

हिन्दी
SamVeda Adhyatmik Bhashya (Pdt. Vishvanatha Vidya Martand) - हिन्दी
Meaning
इन्दुमिन्द्राय (मदच्युतम्) सांसारिक-मस्तियों से छुड़ा देने वाले, (हरिम्) इन्द्रियों को विषयों से हटा देने वाले, (नदीषु) शारीरिक नस-नाड़ियों में (वाजिनम्) टल प्रदान करने वाले, और (इन्द्राय) जीवात्मा के लिये (मत्सरम्) आनन्द-सरोवर, (इन्दुम्) तथा प्रकाशस्वरूप (तम्) उस परमेश्वर को, उपासक लोग, (हिन्वन्ति) अपनी ओर प्रेरित कर लेते हैं, आमर्जित कर लेते हैं, झुका लेते हैं ।
Footnote
[ हरिम् = हृञ् हरणे । नदीषु = “नदी” शब्द का प्रयोग शरीरस्थ नस-नाड़ियों के लिये भी होता है । छान्दोग्य उपनिषद (३। १९।२) में लिखा है “या धमन्यः ता नद्यः” । इस वाक्य में धमनियों को नदियां कहा है। हठयोग में “इडा भगवती गंगा, पिंगला यमुना नदी” (३। १। १०), तथा शिवस्वरोदय में “मध्ये सरस्वतीं विद्यात्” द्वारा शरीरस्थ सुषुम्णा, इडा पिंगला को नदियां कहा है । “समुद्रो यस्य नाड्यः पुरुषेऽधि समाहिताः” (अथर्व १०। ७। १५ में समुद्र-और-नदियों को हृदय-और-नाडियों से उपमित किया है। नदी तथा नाड़ी शब्द उच्चारण भेद से समानार्थक प्रतीत होते हैं । इन्दुम् = इन्धते र्वास्यात् (निरु० १०। ४। ४१) । इन्द्राय = इन्द्र (जीवात्मा), अर्थात् इन्द्रियों का अधिष्ठाता ]